अब वो गलियाँ, वो मकाँ , शामोंसुबह भूल गए ,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए....
इक जीना था लगेदीवार , जाता था छत से कमरे तक ,
चबूतरा था बड़ा , दहलीज़ थी , आँगन था वरांडे तक ,
वो टीन से छत से ढकी रसोई और गुसल खाना ,
वो कमरे में टाँड को ढकते पुरानी साड़ी के पर्दे बनाना ,
सुबह फूलों की कंडिया ,मंदिर की घंटी से नींद का खुलना ,
आरती गाते हुए अंगीठी पे पराठो के संग चॉय का बनना ,
धूँदली सी यादें हैं ज़हन में बस ,काफ़ी कुछ भूल गए ,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए ..
गुलाब का पेड़ , तुरई- लौकी और फूलों की बेलें ,
हथथी के नल का पानी , साइकल की सवारी की खेलें
गरमी में बिजली के भागने पर छत पे तारों संग सो जाना ,
जाड़ों में लिहाफ़ के अंदर ख़ुद को छुपा सिकुड़ दबे जाना ,
पुराने ड्रम में चूने संग नील घोल इकट्ठे दीवाली पे पुताई करना
होली पर बरगुलियॉ ,गाजर की कांजी ,गूँजिया मठरी का बनना
सलूनो पे राखी- सिवैयाँ पतंग माँझा चरखी यादों में झूल गए
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए ..
रातों को गली में कुत्तों के भोंकने पे नींद का खुल जाना ,
सबेरे मंदिर के लाउड्स्पीकर पे चालीसा सुंदरकांड बज जाना
गली के कारख़ाने में बफ़र से पीतल चमकना ,रेडीओ का बजना
कपड़ों का होदी में धुलना - सूखना ,प्रेस कर क्रीज़ संग सजना
क्रिकेट में बॉल के लिए मैच रखना ,चंदे से टीम को चुनना ,
पढ़ाईं के नोट्स माँग के पढ़ना , रातों को देर तक जगना ,
सपनो की बेपरवाह दुनिया थी वो , लम्हे सब धूल में गए,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए ..
अअब वो गलियाँ, वो मकाँ , शामोंसुबह भूल गए ,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए....
Krishna BHATNAGR
Http://krishnabhatnagr.wordpress.काम
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए....
इक जीना था लगेदीवार , जाता था छत से कमरे तक ,
चबूतरा था बड़ा , दहलीज़ थी , आँगन था वरांडे तक ,
वो टीन से छत से ढकी रसोई और गुसल खाना ,
वो कमरे में टाँड को ढकते पुरानी साड़ी के पर्दे बनाना ,
सुबह फूलों की कंडिया ,मंदिर की घंटी से नींद का खुलना ,
आरती गाते हुए अंगीठी पे पराठो के संग चॉय का बनना ,
धूँदली सी यादें हैं ज़हन में बस ,काफ़ी कुछ भूल गए ,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए ..
गुलाब का पेड़ , तुरई- लौकी और फूलों की बेलें ,
हथथी के नल का पानी , साइकल की सवारी की खेलें
गरमी में बिजली के भागने पर छत पे तारों संग सो जाना ,
जाड़ों में लिहाफ़ के अंदर ख़ुद को छुपा सिकुड़ दबे जाना ,
पुराने ड्रम में चूने संग नील घोल इकट्ठे दीवाली पे पुताई करना
होली पर बरगुलियॉ ,गाजर की कांजी ,गूँजिया मठरी का बनना
सलूनो पे राखी- सिवैयाँ पतंग माँझा चरखी यादों में झूल गए
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए ..
रातों को गली में कुत्तों के भोंकने पे नींद का खुल जाना ,
सबेरे मंदिर के लाउड्स्पीकर पे चालीसा सुंदरकांड बज जाना
गली के कारख़ाने में बफ़र से पीतल चमकना ,रेडीओ का बजना
कपड़ों का होदी में धुलना - सूखना ,प्रेस कर क्रीज़ संग सजना
क्रिकेट में बॉल के लिए मैच रखना ,चंदे से टीम को चुनना ,
पढ़ाईं के नोट्स माँग के पढ़ना , रातों को देर तक जगना ,
सपनो की बेपरवाह दुनिया थी वो , लम्हे सब धूल में गए,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए ..
अअब वो गलियाँ, वो मकाँ , शामोंसुबह भूल गए ,
दरोदीवारों की , मुँडेरों की ,शक्लोबयॉँ भूल गए....
Krishna BHATNAGR
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