रविवार, 31 जुलाई 2016

अहसास 20 -खोज

रुष्ट हूँ, संतुष्ट हूँ,
चेहरे से लगता पुष्ट हूँ,
पर क्या कहूँ ,ये  बंदिशे सहूँ
जिंदगी के माने क्या हैं ,
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

छोटे छोटे लम्हात से ,
बातें करते ,हालात से ,
कोशिश करूँ ,जी जान से ,
 घूरें  सभी ,   हैरान से ,
जो चाहूं हूँ , वो ही करूँ
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

रुष्ट हूँ, संतुष्ट हूँ,
चेहरे से लगता पुष्ट हूँ,
पर क्या कहूँ ,ये  बंदिशे सहूँ
जिंदगी के माने क्या हैं ,
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

ये तिश्नगी ,कैसे बुझे ,
कोई तो हल इसका सूझे ,
गर्मी सी है कुछ खून में
करता हूँ सब जूनून में
चलता रहूँ ,हँसता रहूँ
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

रुष्ट हूँ, संतुष्ट हूँ,
चेहरे से लगता पुष्ट हूँ,
पर क्या कहूँ ,ये  बंदिशे सहूँ
जिंदगी के माने क्या हैं ,
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।





अहसास 15 -स्पर्धा

पस्त हो गया,हालात से तृस्त हो गया,,
कोशिश छोड़ देनी चाहिए
समय की गति में खुला बहता छोड़ देना चाहिए ,
गति के विरोध में बहना,
ज्यादा सामर्थ्य और अनंत  कोशिशें ,
पर सामर्थ्य का पता तो किसी को भी नहीं हैं,
और कोशिशों का अंत भी कहीं नहीं है,
हमें हारना स्वीकार क्यों नहीं है
पर क्या  यह वाकई हारना ही है ,
हरोगे तो तब जब स्पर्धा में भागोगे ,
वो भी ऐसी जिसका आखिरी पड़ाव ही स्पर्धा है
जो बार बार खुद ही भाग  लेती है
और वो भी बिना बताये।

अहसास 19 - जीवन


किसको पता है  क्या  ,किसको खबर है ,
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है
कल की  फिकर कैसी ,जो होगा होयेगा ,
यारो के संग जीना , क्या कोई खोयगा

चलना है रीत यहाँ , चलना पड़ेगा ,
सुख दुख को मिल बाँट रहना पड़ेगा ,
जीने का रंग ढंग बदल अब ,जिधर  है।
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है

छींटे है प्यार के यह , होली इनसे खेल ले  ,
 गुलाल इनका बना ,जिंदगी में घोल ले ,
रंगीन कर ले सभी  , आज जो इधर है।
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है.

किसको पता है क्या   किसको खबर है ,
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है
कल की  फिकर कैसी ,जो होगा होयेगा ,
यारो के संग जीना , क्या कोई खोयगा


शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

अहसास 17 - रात


रात काली स्याही जैसी , आये है कुछ चुप से ,
सरगोशी कानो मे आके ,करती है गुप -चुप से।

जगमग जगमग तारे करते , आएंगे कुछ पल में ,
चांदनी छन छन आएगी , खेलेंगे बनके  दल में ,
पानी में परछाई लेके उतरे चाँद है चुप से.
सरगोशी कानो मे आके करता  है  गुप - चुप से ,
रात काली स्याही जैसी , आये है कुछ चुप से ,
सरगोशी कानो मे आके करती है  गुप - चुप से।

काली  बदरी पुरवाई के संग  कहीं उड़ जाएगी ,
जुगनू जैसे चमकेगी फिर , धरती खिल खिल जाएगी ,
नाचेगी फिर हर कोने में , चांदनी छुप -चुप से
सरगोशी कानो मे आके करती है गुप -चुप से 
रात काली स्याही जैसी , आये है कुछ चुप से ,
सरगोशी कानो मे आके करती है गुप - चुप से। 

रविवार, 24 जुलाई 2016

अहसास 16 - कारवाँ

यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,
खुद में ही तू एक कारवां।

चलचला तू चल, सोच न रुकने की
कल सुबह सूरज , उगेगा  सुनने की ,
उसकी तरह तू  ,भी है चमक कर ,
भागेंगा सरपट , यूँ आसमां में ,
यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,
खुद में ही तू एक कारवां।

सिलसिला ये चला , तो न रुक पायेगा ,
एक पल भी यहाँ, न तू थम पाएगा ,
 हर लम्हा होगा ,तेरी कहानी
चूमेगा मंजिल, रब की  जुबां  मे ,
यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,

खुद में ही तू एक कारवां

अहसास 14 -आखिर

चारपाई के पाये , गहरी परछाई के जैसे  साये ,
बांधो से कसके बुनी हुई ,गांठे हैं जैसे चुनी हुई ,
एक दिन येही काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

मंजिलें और कोशिशें सुन सुन थक गये अब   ,
मुरमुरा के यूँ ही यह ढह जायेंगी ,
न जाने किस काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

स्याही जैसे पक्के रंग की फैली, कुछ धुंदली सी ,
कुछ छापे छोड़ जायेंगी।
यादें बन के रह जाएँगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

जगती  से सोई आँखों तक खुलते खुलते ,
सपनो की किरमिच रह जाएगी ,
सिर्फ धूल  हाथ में आएगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

चारपाई के पाये , गहरी परछाई के जैसे  साये ,
बांधो से कसके बुनी हुई ,गांठे हैं जैसे चुनी हुई ,
एक दिन येही काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी। 

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

अहसास -13 -इल्तिज़ा


सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो बेकस ,कितने  बेहाल ,
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो बेकस, कितने  बेहाल।

झुकी झुकी थी नज़र, भागते  वक़्त संग ,
कहनी थी दास्ताँ , जुबाँ थी ख़ुश्क - तंग ,
बिन बुलाई हवा ,कितनी पुरजोर थी,
चाहे उड़ा ले जाना , सारी यादों को संग।
खामोशियां ही वहां ,जो थी कुछ  बोलती,
पूछने को आये हमें कितने ही ख्याल ,
करने थे उनसे  हमें  अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो ,बेकस कितने  बेहाल ,

आंच सी  जल रही, किस कदर दरमियाँ ,
सुलगी  सी साँस में , दहकती गरमियाँ ,
राख में ढूंढ़ते  चिंगारी हो बची ,
नादाँ दिल से छुपा  , टूटता  आशियाँ
अंजान से बने , तिनको को जोड़ते
जख्मो पे मलहम ले  ,करते मलाल
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो ,बेकस कितने  बेहाल ,
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे ,
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

अहसास 12 - दो कदम

 दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तन्हा  मेरे ,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तनहा मेरे ,

होंठ बोलेंगे मगर, कुछ भी न तुम कह पाओगे ,
सरसरी नज़रों से बस तुम ताकते रह जाओगे ,
छूने से कतराओगे ,पास आओगे तन्हा मेरे
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तन्हा मेरे ,

सुखो पत्तो पे चलोगे ,साज से बज जायेंगे ,
उड़ते बालों को जो तुम  रुखसार से हटाओगे ,
बोलती आँखों से न कह पाओगे, तन्हा मेरे,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो, तन्हा मेरे ,

धूप की परछाई में पकड़ोगे कसके मुझको तुम ,
धड़कने बढ़ जाएँगी ,ऑंखें लहू सी होके  तुम ,
उँगलियों से उँगलियाँ कसते बड़ी तन्हां मेरे,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम, तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तन्हा मेरे , ,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम ,तन्हा मेरे।






रविवार, 17 जुलाई 2016

अहसास 11 -इंतज़ार


मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से।

दूर आसमानो में  बादल हैं घुमड़े ऐसे ,
स्वागत में हों खड़े वो ,ख़ुशियों को लेके जैसे ,
देखा है क्या उन्होंने ,मेरे पिया को आते
मन की   व्यथा को मेरे येही उन्हें  बताते,
बेचैन व्याकुल कितनी ,किससे कहलाऊं यहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

सनसन चलें हवाएं , खड़खड़ करें  किवाड़ें ,
करवट बदलती रातें  ,आँखों में उनकी यादें
आहट लगे है धोखा , लगता है वो यहीं हैं ,
हाथो से  बोलते है ,  पलटू कहीं नहीं हैं,
कैसे संदेसा भेजू ,कैसे उन्हें बताऊँ ,आना उन्हें वहां से,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

अहसास 10- सूरज


सुबह सवेरे रोज ही उठकर , सूरज अपनी  किरणे  लेकर ,
बिना बुलाए आ जाता है , जग उजियारा  कर जाता है। 

कौन उसे है रोज उठाता, क्या कोई अलार्म बजाता ,
कैसे फिर वो उठ जाता है,  भर भर रोशनी को लाता है

कैसे वो पाबंद है इतना ,समय चक्र चलता है जितना ,
चाहे कोई कुछ भी बोले , वो बस अपना काम टटोले ,

कुछ भी होय,दुनिया सोए ,वो बस अपने लक्ष्य में खोय ,
कर्म करे जा फल की इच्छा,  मत कर, वो माने लगता है ,

धरती को रोशन कर दिन भर, साँझ ढले जाने लगताहै ,
आसमान  को लाल बना कर ,सागर की सीमा से मिला कर ,

कल आने का वादा करके , मुंह फेरकर सो जाता है ,
सूरज कुछ सिखला जाता है।

सुबह सवेरे रोज ही उठकर , सूरज अपनी किरणें  लेकर ,
बिना बुलाए आ जाता है , जग उजियारा  कर जाता है। 

अहसास 9 -बारिश की बूंदे


बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है  , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं है.

झूमती ,हवा में घूमती, सनसनाती हुई उड़  रहीं हैं ,
छोटी हैं ,थोड़ी सी मोटी हैं,अठखेलियां कर रहीं हैं ,
हवा के साथ में ,जोरो से नाचती ,
हाथ मे हाथ को उसके यूँ बांधती ,
घुंघरुओं की तरह बज रहीं हैं ,

बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं है.

थिरके पांवों से ऐसे नाचे , बादलों में है  बिजली कड़के,
शाख पत्तो से लिपटे-चिपटे ,पेड़ों के  संग जैसे लड़के ,
मीठी धुन पे ,मिस्री घोले ,
हाथ फैलाए ,दिल को खोले ,
बिन हया मस्तियाँ बुन रहीं है ,

बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है  , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं






अहसास 8 -अहसास है हल्का हल्का


लड़का--   अहसास है हल्का हल्का ,आँखों मे कुछ छलका छलका ,
लड़की...   कहते इसे क्या प्यार है ,छाया हमपे क्यों  खुमार है ,
दोनों ..... कुछ ख़ास है ,वो पास है , जीने की मेरे वो आस है।

दोनों....  अहसास है हल्का हल्का , आँखों मे  कुछ छलका छलका। .

लड़की...   देखलो, जी भरके आजतुम , आँखों मे बसा हमको ,
लड़का ... चाहतें  कम,फिर भी होंगी  न , कितना भी देखू तुमको ,
लड़की ... बांहो मे भर लो , जो चाहे कर लो, माना सभी तुमको।

लड़का     अहसास है हल्का हल्का ,आँखों मे कुछ छलका छलका ,
लड़की  ..  कहते इसे क्या प्यार है ,छाया हमपे क्यों खुमार है ,
दोनों ..... कुछ ख़ास है ,वो पास है , जीने की मेरे वो आस है।

लड़की,,,,    हर घडी, देखें हैं तुमको ही, सोते - जागते , बातें करे ,
लड़का,,,    मेरा भी, ऐसा ही हाल है ,कहतें हैं सब ,काली रातें करे,
दोनों,,,,,.... बैठे न चैन है ,करवट बैचैन है ,  तेरे लिए., फरियादें करे।

लड़का      अहसास है हल्का हल्का ,आँखों मे  कुछ छलका छलका ,
लड़की  ..   कहते इसे क्या प्यार है ,छाया हमपे क्यों  खुमार है ,
दोनों ..... कुछ ख़ास है ,वो पास है , जीने की मेरे। वो आस है।

दोनों,,,,,अहसास है हल्का हल्का , आँखों मे कुछ  छलका छलका। .


शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

अहसास 7 -कबीर


बेपरवा बेफिकर ,बादल से बातें कर ,
पानी का ले  बहाव , सागर मे घुल मिलकर
बहती हवा को चीर ,मन में छुपाके धीर ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे है  यह कबीर ,

काहे को है पशेमाँ ,खुद में ही कुछ गुमां ,
धूलों की फांक छांटे , राहों के दरमियाँ ,
 मुठ्ठी में  बंद करके ,सपनो को क्यों है बांधे ,
खुलते ही बिखर जाएँ ,गांठे  क्यों है बांधे ,
कच्चे है सारे धागे , बेमतलब यूँ ही छांटे ,
खूंटे को तोड़ ,सरपट तू दौड़, उखाड़ फैंक कांटे,
मन मे तेरे है बसा , जिसको  तू माने है पीर ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे  है  यह कबीर।

खुशियों के चंद  ये  पल , चल  गांठ में बांध ले,
जोरो से हंस दे तू , मिल बाँट आ काट ले ,
दुनिया है यह तो यूँ ही, ऐसे ही चलेगी यार ,
कोई न  बदल पाएगा इसे,  यूँ हीं ले स्वीकार ,
हाथों की यह लकीरें  ,किस्मत की हैं तस्वीरें
थोड़ा सा सयंम, तू रख ,बदल जाएँगी तकदीरें ,
है हाथ में तेरे ही , कहतें जिसे हैं  तदबीर  ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे  है यह कबीर।

बेपरवा बेफिकर ,बादल से बातें कर ,
पानी का ले  बहाव , सागर मे घुल मिलकर
बहती हवा को चीर ,मन में छुपाके धीर ,

पंछी समान उड़ जा , कहवे है  यह कबीर ,







अहसास 6-उड़ान


उडूं , या फिर यूँ ही चलता रहूं, औरों की तरह ,
इस डर से कि अगर उड़ा, तो कोई दबोच लगा ,
अपने पंजो में कसकर इस तरह ,
कि  निकलने की सोच ही छूट जाएगी।

पर नहीं उड़ा ,तो पंख खुट्टल हो जायेंगे ,
उड़ना तो लगता है ,भूल ही गए हैं यह
खुलेंगे भी नहीं आगे चलकर तो ,
हवा को चीर कर, आसमानो को छूना तो दूर
फुदकने के लायक भी बचेंगे क्या, शक है।

उड़ना तो  खैर स्वाभाविक क्रिया  है ,
जरूरत है ,पड़ेगा ही ,इसमें क्या सोचना ,
रैंगना ,चलना ,दौड़ना और फिर उड़ना ,
यही तो सिलसिला है प्रकृति का ,
अपने छुपे पंखो को फैलाओ ,
फड़फड़ाओ ,हवा की दिशा को भाँपो
पहले कम ऊँचा , फिर और  ऊँचा
और फिर बादलों\ को  छू  आओ।

ऊपर से ही देखने पर हर चीज़ छोटी लगती है ,











बुधवार, 13 जुलाई 2016

अहसास 5 -इश्क


माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,

इसको है समझना ना ,आसान यूँ चुटकी सा ,
लगता है इसे धर लें ,मुठ्ठी बंद  काबू सा ,
इस खेल को हर कोई, चाहे है  कि खेले कुछ ,
हर किसके नहीं बसका ,पल में बेकाबू सा ,

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,


इसका है नशा सर पे, ऐसे चढ़कर बोले ,
कुछ बोलें पागलपन ,कुछ होश नहीं रहता
पट भीतर के खोले ,खुद ही खुद से बोलें,
जगती आखों से वो  सपने देखे रहता।

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है.

किस्से कितने इसके, लिख्खे हैं किताबों में ,
जीता है कभी हारा ,पर हार न ये माना ,
कोई भी हुकूमत हो , कोई भी सियासत हो ,
हर जंग हुई खातिर, सबने है इसे जाना।

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,






मंगलवार, 12 जुलाई 2016

अहसास 4 -उमंग


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया  बेच खाई।

 बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई। 

गाये ,गाये जा तू  , किसको न किसकी पड़ी ,
सोचे इतना तू क्यों  , खुशियों की है फुलझड़ी ,
घूमें- नाचे- कूदे ,करना है जो भी  तू कर ,
फूटे खुशियां ऐसे, पटाखों की जो लड़ी 
धरती हिला दे आज ,सबको दिखा दे आज ,
चकरी है ऐसी घुमाई 
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया बेच खाई 






अहसास 4 -उमंग


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया  बेच खाई।

 बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई। 

गाये ,गाये जा तू  , किसको न किसकी पड़ी ,
सोचे इतना तू क्यों  , खुशियों की है फुलझड़ी ,
घूमें- नाचे- कूदे ,करना है जो भी  तू कर ,
फूटे खुशियां ऐसे, पटाखों की जो लड़ी 
धरती हिला दे आज ,सबको दिखा दे आज ,
चकरी है ऐसी घुमाई 
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया बेच खाई 






अहसास 3 -जीवन


जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

चलते चलते  हर पल ,कहता है की चलता रह ,
थमना हैं नहीं एक पल , चलना है की चलता रह ,
फुरसत को तलाशे  क्यों ,  घूमे फिरता है तू 
थकने का समय किसपे , जोरो से है चिल्लाए,

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

आँखों मे भरी है कुछ ,कूदी हुई  किलकारी ,
होटों पे बसी मीठी, गीतों की सदा प्यारी ,
उड़ने को करे है मन  ,पर हैं कहीँ  मिल जाएँ  ,
बादल को मैं छू लूँ , मुठ्ठी मैं समा जाये ,

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

भूला बिसरा बचपन , आंखों में उतर आता  ,
पेड़ों के झुरमुट का, मंज़र है बुला जाता ,
चोटों का , डाटों का , पापा के चांटो का ,
माँ के हांथों का प्यार , है याद बहुत आये 

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ ,  बातें नई सिखलाये।





अहसास २ -बारिश


बारिश की  यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है , रातों के सवेरे से ,
पायल की मीठी सी, गूंजे है बजें मन में  ,
ख्याबो मैं आती वो , बिन बोले धीरे से।

उनके मन को पढ़ना,  आसान नहीं है कुछ ,
आँखों की गहराई ,थाह जिनकी नहीं है कुछ,
होठों की अंगड़ाई में ,लिक्खी  हैं कहानी सी ,
चलती है हवाओं सी, बेपरवाह लगे है कुछ,
सोचूं हूँ चलूँ पूछूं  मैं आज उन्हें फिर से ,
ख्याबो मैं आती क्यों  , बिन बोले धीरे से।

बारिश की   यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।

भीगी भीगी लट को हांथों से कर पीछे ,
पलकों  की चिलमन से बूँदों को पिएं ,रीझें ,
उड़ते से दुप्पटे को कसकर के लपेटें यूँ ,
मुझको हैँ पकड़ करके ,जोरों से जो हैं भींचे ,
नींदों से भरी ऑंखें ,मचले हैं नशे भर से  ,
पांवों मैं है  हलचल यूँ ,बिन पिए शराबी से.

बारिश की यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।


सोमवार, 11 जुलाई 2016

अहसास 1 - मोहब्बत


हम देखें है  सपना, जिसे  नाम  मोहब्बत है ,
इसे  देख देख जीते ,भरी इसमें शरारत है ,

यह खेल अजब ही है  जिसमें  उलझी  पारो ,
कहीं हीर , कहीं  लैला ,शीरी भी  गयी  हारो ,
आँखों में  उतर आती ,एक कसक मशक्कत है ,
इसे   देख देख जीते ,भरी इसमें शरारत है ,

अंकों की  यह दुनिया  क्या  समझेगी इसको ,
यह इश्क इबादत है ,मिलता नहीं है   सबको,
कितने ही जतन करके  ,इसके पीछे भागे ,
इसको पाना खुद से खुद  ही  में करामत  है।

हम देखें है  सपना, जिसे  नाम  मोहब्बत है ,
इसे  देख देख जीते ,भरी इसमें शरारत है ,