रविवार, 31 जुलाई 2016

अहसास 15 -स्पर्धा

पस्त हो गया,हालात से तृस्त हो गया,,
कोशिश छोड़ देनी चाहिए
समय की गति में खुला बहता छोड़ देना चाहिए ,
गति के विरोध में बहना,
ज्यादा सामर्थ्य और अनंत  कोशिशें ,
पर सामर्थ्य का पता तो किसी को भी नहीं हैं,
और कोशिशों का अंत भी कहीं नहीं है,
हमें हारना स्वीकार क्यों नहीं है
पर क्या  यह वाकई हारना ही है ,
हरोगे तो तब जब स्पर्धा में भागोगे ,
वो भी ऐसी जिसका आखिरी पड़ाव ही स्पर्धा है
जो बार बार खुद ही भाग  लेती है
और वो भी बिना बताये।

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