रविवार, 24 जुलाई 2016

अहसास 14 -आखिर

चारपाई के पाये , गहरी परछाई के जैसे  साये ,
बांधो से कसके बुनी हुई ,गांठे हैं जैसे चुनी हुई ,
एक दिन येही काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

मंजिलें और कोशिशें सुन सुन थक गये अब   ,
मुरमुरा के यूँ ही यह ढह जायेंगी ,
न जाने किस काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

स्याही जैसे पक्के रंग की फैली, कुछ धुंदली सी ,
कुछ छापे छोड़ जायेंगी।
यादें बन के रह जाएँगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

जगती  से सोई आँखों तक खुलते खुलते ,
सपनो की किरमिच रह जाएगी ,
सिर्फ धूल  हाथ में आएगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

चारपाई के पाये , गहरी परछाई के जैसे  साये ,
बांधो से कसके बुनी हुई ,गांठे हैं जैसे चुनी हुई ,
एक दिन येही काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी। 

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