बारिश की यह गुनगुन , कहती कुछ धीरे से ,
एक चुप सी आहट है , रातों के सवेरे से ,
पायल की मीठी सी, गूंजे है बजें मन में ,
ख्याबो मैं आती वो , बिन बोले धीरे से।
उनके मन को पढ़ना, आसान नहीं है कुछ ,
आँखों की गहराई ,थाह जिनकी नहीं है कुछ,
होठों की अंगड़ाई में ,लिक्खी हैं कहानी सी ,
चलती है हवाओं सी, बेपरवाह लगे है कुछ,
सोचूं हूँ चलूँ पूछूं मैं आज उन्हें फिर से ,
ख्याबो मैं आती क्यों , बिन बोले धीरे से।
बारिश की यह गुनगुन , कहती कुछ धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।
भीगी भीगी लट को हांथों से कर पीछे ,
पलकों की चिलमन से बूँदों को पिएं ,रीझें ,
उड़ते से दुप्पटे को कसकर के लपेटें यूँ ,
मुझको हैँ पकड़ करके ,जोरों से जो हैं भींचे ,
नींदों से भरी ऑंखें ,मचले हैं नशे भर से ,
पांवों मैं है हलचल यूँ ,बिन पिए शराबी से.
बारिश की यह गुनगुन , कहती कुछ धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।
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