मंगलवार, 12 जुलाई 2016

अहसास २ -बारिश


बारिश की  यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है , रातों के सवेरे से ,
पायल की मीठी सी, गूंजे है बजें मन में  ,
ख्याबो मैं आती वो , बिन बोले धीरे से।

उनके मन को पढ़ना,  आसान नहीं है कुछ ,
आँखों की गहराई ,थाह जिनकी नहीं है कुछ,
होठों की अंगड़ाई में ,लिक्खी  हैं कहानी सी ,
चलती है हवाओं सी, बेपरवाह लगे है कुछ,
सोचूं हूँ चलूँ पूछूं  मैं आज उन्हें फिर से ,
ख्याबो मैं आती क्यों  , बिन बोले धीरे से।

बारिश की   यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।

भीगी भीगी लट को हांथों से कर पीछे ,
पलकों  की चिलमन से बूँदों को पिएं ,रीझें ,
उड़ते से दुप्पटे को कसकर के लपेटें यूँ ,
मुझको हैँ पकड़ करके ,जोरों से जो हैं भींचे ,
नींदों से भरी ऑंखें ,मचले हैं नशे भर से  ,
पांवों मैं है  हलचल यूँ ,बिन पिए शराबी से.

बारिश की यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें