मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

अहसास 58 -ख्वाईश

आज लिखते हैं तो ढूँढें है सुनाने को कोई ,
 होगा एक दौर यक़ीनन जो वो ढूँढेंगे हमें,

आज लफ़्ज़ों की क़िल्लत की बात करते हैं ,
कल वही पढ़के किताबों से बताएँगे किस्से उन्हें,

दबी एक भूख उतरती है सफ़हे पर खुलके ,
बंद संदूकचीं के कोने में छुपा देते आज जिन्हें ,

कुछ ख़लिश तो है दिल के कोने में आवाज़ें करती ,
बिखरी झूठी यह हँसी होठों पे छलती आज उन्हें ,

 ज़मीं से यूँ  हैं जुड़े ,आसमाँ की बातें करें 
देखके खवाईशें ऐसी कि ,रंजिशें हैं उन्हें .

कहें हैं दोस्त मगर करते रवाएते ग़ैरों सी है वो ,
ना खुलके मिलते हैं ,हँसते हैं ,क्या हुआ है उन्हें .


बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

अहसास 59 -डर लगता है मुझे ...........

मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे
तुम्हारी आँखों के घूरते सवालों से डर लगता है मुझे,

सपनों के घरोंदो को आशाओं के धागों से,
उम्मीद की किरणों के बेफ़िक्र इरादों से
चुन चुन के बुना है यह , खोने से डर लगता है मुझे,
मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे 

कितना हैं सकूँ मिलता पहलू में तेरे आके ,
हूँ भूल गया सब कुछ  तुमको जहाँ में पाके.
तेरी साँसों के उतार चढ़ाव से डर लगता है मुझे
मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे ,


तेरे होंठों की नमी , स्याही आँखों की ,खींचे है यूँ 
उड़ती बालों की लट , माथे की शिकंन  बांधे है यूँ 
तेरे नज़दीक आने  छू जाने से , डर लगता हैं मुझे
मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे ,


बारिशों में संग भीगे देर तलक कसके  पकड़ यूँ 
धड़कने मिल जाए ख़ून की रवानगी में बहके  यूँ 
बहक जाएँ क़दम , फिसलते हुए डर लगता है मुझे
मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे , 
तुम्हारी आँखों के घूरते सवालों से डर लगता है मुझे