शनिवार, 24 सितंबर 2016

अहसास 45 - पैग़ाम

चिड़ियों की चहचआहट ,
रस्ते पे चलती आहट
पानी की बहती  कलकल
पत्तो की सरसराहट

मिटटी की गीली  खूशबू
आसमाँ  की नीली छतरी
सूरज के चलते फिरते ,
धूप के रंग बदलते
बादलों की गड़गड़ाहट
पसीने की कड़वाहट

मस्ती भरी सुबह और कूदती फिरती शाम ,
बाँटती   रहती हर पल  यही एक ही पैगाम ,
जिंदगी है बड़ी बेशकीमती मेरे यार
जीलो इसे जी भरके ,करलो इसे प्यार
इससे पहले की हथेली से फिसल जाये ,
पकड़लो इसे कसके और करलो अपने मन का
बिना कुछ समझे , झिझके- रोके । 

अहसास 44 - सपने ....

मैंने कुछ सपने देखे है ,कैसे तुमको दिखलाऊँ ,
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है ....... 

यह ऊँची  उड़ती इन उमंगो को लगाम क्या बाँधू ,
इन थिरके क़दमों का करूँ क्या ,कैसे इनको साधू  ,
इन कांपते  होठों से उनको ,प्यार करूँ बतलाऊँ 
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है .......

तुम्हे देखा जबसे दिल में उठने लगीं है कितनी हिलोरें ,
बाँहों में  भर लो आके मुझको , मैं फूल हूँ तुम हों भौरें ,
इन कोमल कोमल पंखुड़ियों को खोल तुम्हें  समाऊं 
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है ....... ,

यह पुरवैया के साथ चलूँ मेरे चितवन चमके, गायें ,
सोई हों  या जागी हों  यह , मटक मटक इतरायें ,
खुशबू उनकी महसूस करूँ ,हर आहट से बहलाऊँ
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है .......

अहसास 42 - हरेक पल ........

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही ,
कश्मकश में  फँसी ,है भंवर में धंसी ,
थक गयी है लड़े कितना , ढह न जाये कहीं ,

आंच ऐसी लगी  ,सुलगी सुलगी फिरे ,
चूल्हा ठंडा पड़ा , पानी छींटे  गिरें  
राख उड़ है रही ,मुठ्ठी में बांध लूं ,
इससे पहले कि कुछ कसक रह जाये कहीं

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही ,

कोई नहीं गिला ,किसी से रखे है अब ,
उम्मीद की किरण,  गोया बुझ चुकी है जब 
हर इक सुबह वही है ,वही है शाम अब ,
कुछ भी नया नहीं है, राहों में घूमे वहीँ ,

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,

छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही 

शाना नहीं है कोई  सर , रखके रोलें हम
हाले दिल बताएं किसे , जुबां सीके रख्खे हम ,
बेपरवा सांसे तेज चलें ,लड़खड़ायें  कदम
रस्ते का पता है नहीं , मंजिल का पता  नहीं ,

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

अहसास 41 -तुम ही हो........

आजकल कभी कभी मैं खुद से ही पूछने लगा  हूँ ,
कहीं मैं  तुमसे वाकई प्यार  तो नहीं करने लगा हूँ ?
या फिर ,अपने दिल को  यूँ ही बस बहलाने लगा हूँ ?

रात के सन्नाटे को चीरकर , तुम्हारी यादे जब ,
मेरे दिल के किसी कोने को जोरो से  झंझोड़ती हैं ,
और मुझे उस गहरी नींद के मीठे -मीठे सपनो के हिचकौलो से  ,
खींच - निकालकर  झटके से बाहर लातीं हैं ,
तो मैं यकायक ही चौंक कर उठ जाता हूँ ,
और अपने हाथ पे  चिकोटी काटकर ,
खुद को यह अहसास दिलाने की कोशिश करता हूँ
कि यह  सपना था ,हकीकत नहीं ,

पर  क्या तुम इसको मानोगी ?
मुझे पक्का मालूम है ,तुम नाही  कहोगी ,
पर मैं भी  क्या करूँ ,
शायद .... तुमको समझा ही   न पाऊं ,
मेरी इन सरफिरी सी  बातों को सुनकर ,
तुम नाराज़ यकीनन  ही  होगी मुझसे ,
और फिर मन ही मन गुस्सा निकल रही होगी ,
अपनी उँगलियों से कागजो को मोड़ते हुए ,
या फिर कलम से उन पर कुछ भी उल्टा सीधा बनाते हुये ,
या फिर कहीं पर भी मेरा  नाम लिख- लिख ,
खुद ही बार बार काट रही होगी ,

काश मैं तुमको समझा  पाता ,
तुम्हारी आँखों की गहराई में झांककर ,
उन सागरों की तह को पा  पाता ,
उनमें  बिखरे हए उन ढेर सारे मोतियों को चुन पाता ,
क्योंकि मैं नहीं चाहता वो मोती आंसुओं का रूप लेकर ,
उन गुलाबी मखमली से गालों पर लुढककर   ,
मुझको  मेरी उस हसीन तनहाई  से जुदा  कर दें ,

तुम सुन रहीं हो ना ,मेरी बातों को गौर से  ,
या फिर उसे मेरा पागलपन या  दीवानगी समझकर
हवा में पतंग की तरह  बेझिझक  उड़ा  रही हो ,
मैं यह जानता हूँ कि  तुम यह दिखाने की असफल कोशिश
करती रहती हो ,
पर हर बार  ये ,कमबख्त दिल ,यही  कहता रहता  है
कि  यह सही नहीं है,
क्योंकि तुम जानती हो मुझे ,मुझसे भी अच्छी तरह ,
आखिर ये तुम ही हो जो मुझसे प्यार करती हो बेइंतिहा, बेसबब   ........

written in 2000








रविवार, 18 सितंबर 2016

अहसास 43 -मौसम ......

थोड़ा रूमानी आओ हो जायें ,
मौसमों के , संग हम भी ,
रंगीं मंजर  में, आओ खो जायें ,

थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , ......

तेरी आँखों में, उठ रही ये ,
कुछ कहानी, पढ़ रहा हूँ ,
होठ तेरे, बिन कहे ही ,
कह रहे क्या ,पढ़ रही हूँ ,
इन हवाओं के खुश तरन्नुम मे
बहते- बहते आओ बह जायें ,
थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , ......

बारिशों में संग भीगें ,
लिपटें -चिपटें , जलता है तन 
दहके अरमां , यूँ न बहका 
थाम ले तू   दिल की धड़कन ,
दिल की इस पल कुछ भी न  सुन ,
वक़्त यह यूँ हीं ,ऐसे थम जाये ,
थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , 

थोड़ा रूमानी आओ हो जायें 
मौसमों के , संग हम भी ,
रंगीं मंजर  में, आओ खो जायें ,
थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , ...... 

अहसास 40 -तुम आओगी जरूर.......

चिनार के दरख्तों के पीछे से ,
सायं -सायं करती हुई आवाजो के बीच ,
जमीन के सूखे पड़े पत्तो पर चलने से ,
मदहोश संगीत पैदा करते हुए,
तुम आओगी जरूर।

मैं वहीँ रहगुजर में ,एक पेड के तने से ,
पीठ और सर को टिकाये ,
अपनी गीली हथेलियों को मसलते हुए ,
उस वीराने में ,तुम्हारा  इन्तजार कर रहा था ,

सर्द  भीगी  हवाओं में ,
किटकिटाते दांतो की आवाजों को रोकते  ,
और होठों को जोर से भींच दबाये हुये ,
 मोटे बेलगाम उड़ते हुए  दुपट्टे को
कसकर सर पर लपेटकर ,
सीने को  ढांपते और बालों को सँभालते हुए ,
देर रात तक जागकर रोने से ,
मोटी हुई लाल आँखों को झुकाकर ,
जिनमे अभी भी उतनी ही नमी है ,
 नज़रों को चुराते हुए ,
तुम आओगी जरूर।

उन ढेर सारी कही -अनकही ,
पतंग की डोर की तरह
उलझी हुई बातों को सुलझाने के लिए नहीं ,
बल्कि उन मुड़े- तुड़े बासी , कुछ पीले -सफ़ेद कागजो ,
और कुछ  तस्वीरों को वापिस लेने के लिए ,
जिनसे आज भी तुम्हारी वही  भीनी -भीनी  खुशबू आती है ,
जिनको तकिये के गलेफ के अंदर रखकर ,
कितनी अनगिनत रातें मैंने करवट बदलते हुए ,
और सोते -जागते गुजार दीं ,

थोड़ा पास आने पर कागजो पर लिखी कहानियों को ,
जब उन कांपते हुये हाथों ने थामा तो ,
उन लबलबाती आँखों की गहराईयों में ,
और उन लरजते हुए होठों पर ,
मुझे कितनी मजबूरियां और  गुजारिशें दिखाईं दी ,
वो लम्हे, जिंदगी शायद यूँ ही थम गई थी,
जो आज तक बस उसी तरह ,वहीँ थमी हुई है  ,,,,,,,,,      

written in 2000


मंगलवार, 13 सितंबर 2016

अहसास 42 -नींद

नींद आ रही है , मुझको जोर से ,
आज जग गया  था मैं तो भोर से ,

सारे दिन तो भागता  मैं यूँ फिरा ,
सर पे डाले  बोझ ,यूँ उठा -गिरा ,
सुबह से हुई जो शाम न खबर ,
सो गया था राह में ,उठा शोर से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,

पैर क्या बेचारे कुछ भी बोलते ,
हो गए थे मोटे , थोड़े डोलते ,
गर्म पानी में  नमक सा डालकर ,
उनको डाला ,खुल गए वो पोर से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,

नींद में भी  तंग है दिन की कहीं ,
उठ गए , उड़ सी गयी कमबख्त ही ,
रात है सुनसान सी सनसन  करे।
बिखरी यादें है समेटे होड़ से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,
आज जग गया  था मैं तो भोर से।

रविवार, 11 सितंबर 2016

अहसास 39 -डर

कभी कभी अचानक बैठे बैठे,
पता नहीं कब व क्यों,
मैं  सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ,
कि  मैं क्या कर रहा हूँ ,
या क्या कर पा   रहा हूँ अपने साथ ,
या फिर अपने साथ जुड़े  उन तमाम लोगों  से साथ ,
जिनसे मेरी जड़ें जुडी हुई हैं कुछ उलझी हुई सी ,
जिन्होंने इस तरह जकड रखा है
कि  मैं चाहकर भी हटा नहीं सकता ,
उस चक्र को ,जो विरासत में  मिला हैं।

क्या मैं वाकई मे खुश हूं ?
या फिर ख़ुशी को ढूंढने की नाकाम कोशिश  कर रहा हूं ,
या शायद मैं यह जानता ही नहीं हूँ ,
कि ख़ुशी आखिरकार  किस चिड़िया का नाम हैं ,
या फिर कैसे और  कहाँ मिलती है

जहाँ तक मुझे याद पड़ता है
लोग कहते हैं कि मैं हँसता बहुत हूँ ,
पर क्या हंसना ही ख़ुशी है ?
मैं नहीं मानता।
हो सकता है उन्हें खुलकर  हंसने की आदत ही नहीं हो ,
या फिर डरते हों , यह सोचकर ,कि  लोग क्या कहंगे ,
इतनी जोर से हँसता है ,
बिलकुल बच्चो की तरह।

आखिर अब वो बड़े हो चुके हैं ,
उन्हें जिंदगी के कुछ तौर -तरीकों  को मानना  है
जोकि उनका तथाकथित ,बकौल उनका, समाज सिखाता है ,
पर यह समाज, सिर्फ बंधन ही क्यों लगता है ,
यह मत करो , वो मत करो,
ऐसे मत बैठो,,बैसे बात मत करो ,
इसको ऐसे ही करना होता है ,हर बात पे क्यों करना है ,नहीं पूछते ,
खैर छोड़ो ...

असलियत में  यह  उन लोगों की जमात है ,
जिनकी   परिभाषाएं , आदमी के वज़ूद  को देखकर  ,
बदल जाती हैं ,
लेकिन मेरी परिभाषा नहीं बदलती ,
तभी मैं अपने आप को कई बार बड़ा असहज सा पाता हूँ ,
या यूँ  कह लीजिये ,कि  गोया लोगो को मेरे साथ असहज सा  लगता है ,
पर इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ,
मैं तो जानता हूँ, कि  मेरी बात  सुनी ही नहीं जाएगी ,
वो मानेंगे ही नहीं ,फिलहाल  तो संख्या मे वो ही ज्यादा हैं ,
पर यह जरूरी तो नहीं कि जो ज्यादा लोग बोलें ,वो सही ही  हो ,
मेरा मानना  है कि वो अपने अनुभव से ऐसे बन गए है ,
उन्होंने अपने चारो ओर एक खोल सा पहन लिया है ,
जिसे वो चाहकर भी खोल नहीं पा रहें है ,
और अब  ..... ,
अब तो शायद आदत सी हो चुकी  है ,
उन्हें खुद ही पता नहीं है कि वो ऐसे कब और क्यों बन गए ,
यूँ ही चलते -भागते ,जिंदगी को बहुत पीछे छोड़ आएं है वो,

उनकी निगाह में जिंदगी ,
एक मजबूरी है ,जिम्मेदारी है
जिसमें बंधन है ,जो ख़ुशी का बिलकुल नहीं है ,
कम से कम उनको देखकर तो यह ही लगता है ,
कभी -कभी तो लगता है जैसे उनके परों को ,
किसी ने बांध रक्खा है ,
जकड रखा है ,उनकी इच्छायों को कसकरके ,
और अब तो वो,
 उड़ने की कल्पना से ही  घबरा जाते हैं ,
अगर गिर पड़े तो ,
जमीं ही ठीक है ,चोट तो कम लगेगी --------     

written in 2000


अहसास 38 - यादें

रेत में छोटे-छोटे से घरोंदे बनाते -बनाते ,
मैं कब बड़ा हो गया ,
और बड़ी -बड़ी इमारतें बनानी शुरू कर दीं ,
मालूम  ही नहीं चला ,

बचपन की मीठी यादें ,
मैंने आज भी सजों रखीं हैं ,
जैसे यह , बस कल ही की बात हो,
रेत  से सने  कपड़ों को देखकर ,
कितनी डांटे  और थप्पड़ की मार ,
और  आज,
आज कौन है ?
यह देखने वाला ,या डांटने वाला ,
कि धूल या मिट्टी , कहाँ से लगाके आया हूँ ,

शाम को उन काले- काले  मजदूरों के बीच से  ,
 कपड़ों से कुछ ढके- कुछ अनढके से ,
उनके बच्चो  की घूरती आँखों से  छुप ,
सीमेंट ,रेत  और ईंटों के ढेर से ,
अपने आप को बचाते- बचाते ,
जब मैं  घर पहुंचता हूँ ,
तो उन अकेली सी सफ़ेद  दीवारों से ,
और उनपे लगी तस्वीरों से ,
ढेर सारी  शिकायतें सुनने को मिलती हैं ,
पर मैं क्या करुं ,
उनका अकेलापन दूर करते- करते ,
मैं खुद कितना अकेला हो गया ,
पता ही नहीं चला  ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

written in  2000

शनिवार, 10 सितंबर 2016

अहसास 37 - जिंदगी

रात को अकेले बैठे -बैठे ,
अपने ही ख्यालो से बातें करते - करते ,
मुझे दूर -दूर तक का सन्नाटा ,
और उस सन्नाटे को चीरते हुए ,
बारिश में वो झींगुरों की आवाजें ,
अचानक की कुछ कुरेदती सी लगीं ,
 उलट पलट करके ,
किसी पुराने रिस्ते हुए जख्म को ,
जो अभी भी सूखा नहीं था ,

मैं भूल ही गया था ,कि मैं अकेला हूँ ,
कहाँ हूँ ? इतनी सारी  आवाजें तो  हैं ना ,
बारिश की  जोरों से गूंजने वाली ,
 टप- टप तो कभी छप -छप की आवाजें ,
बादल की  गड़गड़ाहट,तो  बिजली की कड़कड़ाहट  ,
तेज हवाओं  से  खिड़की के खड़खड़ाहट ,
सड़क पे अचानक कुछ  लोगों की
चलते -चलते बातें करते हुए ,
जोरों से खंखारने की,
 धीरे- धीरे दूर चले जाने की आवाजें ,
चौकीदार की सीटी और डंडे को ,
जमीन पर पटकने की धम -धम की आवाजें ,

ख़ामोशी तो है ही नहीं ,
सिर्फ एक मैं हूँ जो अपने आप में ही  खामोश है,
क्योंकि बोलने को कोई है ही नहीं ,
सिर्फ यह चंद कागज हैं ,
और उन पर चलती या मचलती यह कलम ,
जिनसे कभी कभी कुछ कह लेता हूँ,
या कुछ सुन  लेता हूँ ,

पर यह ही तो  तो काफी नहीं है ना , 
कोई और भी तो चाहिये ,
जिससे लड़ सकूँ , उन बातों पर ,
जो उसे पसंद हों और मुझे नापसंद ,
मेरे उस सुनसान रात के सन्नाटे में ,
जिसकी किसी बात पर जोर ठहाका मारकर हंसने पर,
  ऊँगली अपने  गीले होठों पे रखके हिश..... ... धीरे से.........
 करके टोकने वाला हाड़ -मांस का ,
चलता -फिरता कोई संगदिल रहगुजर ,
जिसकी आँखों में  नींद भरी होने के बावजूद ,
मैं जबरदस्ती अपने लिखे उलटे -सीधे पन्नो को ,
उसको पढ़कर सुना सकूं ,
और बार बार , कैसा है , पूछकर ,
बहुत अच्छा है , कहने पर मजबूर कर सकूँ ,

पर मैं न जाने क्यों हर बार ही यह भूल जाता हूँ ,
यह कोई सपना नहीं है ,
जिंदगी है ,
और जिंदगी ऐसी ही होती है।

written in 2000 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

अहसास 36 - कुछ जरा ......

भागते- भागते ,  बैठलें कुछ  जरा  ,
ये फिसलता समय , कस पकड़ लें जरा ,
आस की गांठ को ,थोड़ी ढीली करें ,
पोटली है मुक्कदर की खोलें जरा
भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........

कुछ तो ऐसा करें,  हो मजा ढेर सा
खुदबखुद ही लगे, है सवा सेर सा ,
दिखने में कुछ नहीं ,सुनने में हो सरल ,
चाहे  छोटा ही हो ,लगे बड़े  घेर सा
दोस्तो की तरह, दिल को खोलें जरा ,
थोड़ी उनसे कहें ,सुन लें उनको जरा।

भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........

बाँट लें जो मिलें , थोड़ा ही हो सही
जिसमें खुशियां मिलें ,काम होता वही
मंजिलों  से नज़र , न कभी भी हटे ,
करना जो भी पड़े ,तोड़ें -जोड़ें वही ,
अक्स जो है जहन में , छाप दें वो जरा
दुनियादारी की  छोड़ें , दिल की सुनलें जरा

भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........










शनिवार, 3 सितंबर 2016

अहसास 35 -प्यार

प्यार ,एक ऐसा शब्द ,
जो अपने आप मे एक कहानी है ,
थोड़ी सुहानी  है , थोडा  रूमानी  है ,
जिसको आप जितने लोगों से पूछेंगे , उतने मतलब,
जो हो सकता है ,किसी से भी, कहीं भी,और कैसे भी ,
जिसमें  आँखों की नींद उड़ जाती है ,
भूख पता नहीं क्यों , अपने आप ही मिट जाती है ,
हर बात पे एक ,मीठी सी ,ख़ुशी मिलती है ,
और हर साँस में एक खुश्बू सी आती है ,

लोग बैठे बैठे शायर बन जाते हैं ,
और शब्दो को जोड़ते -जोड़ते ,
किसी भी  कागज पर ,कहीं  पे भी ,
न जाने कब और कैसे ,एक ग़ज़ल सी बन जाती है ,

जो शुरू हुआ था कभी ,
श्री-फरहाद , सोहनी -महिवाल ,लैला- मजनू ,
और रोमियो-जूलिएट से ,
जिसको समझने के लिये लोगों को जन्मों लग गये ,
जिसके ऊपर शायरों ने अनगिनत  पन्ने भर दिये ,
जिसकी वजह से इतिहास में तारीखें लिखी गयीं ,
जिसकी गहराई सागर की तलहटी से भी ज्यादा है ,
जिसमें डूबकर जब खो जाते हैं ,

जो सिर्फ देने की चीज़  है , लेने की नहीं ,
जिसमें आपको लगता है कि आप उड़'रहें हैं ,
उड़ रहें हैं , उन ऊंचाइयों के भी ऊपर ,
बिना परों के ही ,उस नीले आसमांनो  में  कहीं  ,
सफ़ेद,कुछ काले से , छितराये हुये ,बादलों के बीच ,

पर यह हर किसी को नहीं मिलता ,
और सबको इसी की तो तलाश है।

written in 2000

अहसास 34 -शांत

कल अचानक सड़क पे चलते -चलते ,
मुझको यकायक ही यह ख्याल आया,
कि चलो आज ,जिंदगी से ही मिलते चले जायें ,
जिंदगी ,जो शुरू हुई थी,आदम और इव से ,
पर अंत पता नहीं कहाँ है
शायद अनंत तक।

वैसे यह मालूम तो किसी को भी नहीं है ,
लेकिन इसकी खोज में सब , एक दूसरे के पीछे ,
पागलो की तरह भागे चले जा रहे हैं ,
कौन बीच में  गिर रहा है ,कैसे संभल रहा है ,
किसको फुरसत है ये देखने की ,
दिन ब दिन लोग बढ़ते जा रहें हैं ,
और  जगह कम होती जा रहीं है ,
थक-थक के गिर रहें हैं तरबतर ,
पर भागने की हौंस दिल में  बढ़ती ही जा रही है ,
पता नहींकिस ओर , और  क्या है इस मृगतृष्णा में।

वहीँ दूर , उन लहराती, ऊँची , खूबसूरत सी ,
आसमां को चूमती , पहाड़ों की वादियों   में ,
जहाँ ,या तो सिर्फ हरियाली है ,
या फिर ,सफ़ेद ,बिलकुल सफ़ेद ,
बर्फ की चादरों  का ओढा हुआ एक मंजर ,
जब वो व्यक्ति ,
जिसकी  मूंछे इतनी बड़ी  हैं कि ,
 दाढ़ी के बीच में  जाकर कहीं खो गयीं हैं ,
जिसके बालों का रंग ,दाढ़ी व मूंछों के रंग के साथ
बिलकुल सफ़ेद हो चूका है ,

पहाड़ों से घिरे उस मंदिर के दालान मे खड़े होकर ,
जब बर्फ के  रंग जैसे शंख को अपने होठों से लगाकर ,
अपने गालों में हवा भरकर ,
आसमान की ओर आँखों को कर ,
पुरजोर से  है बजाता  है ,
तो सारी वादियों  गूँज उठती हैं
उन  मिश्री घुली मीठी सी आवाजों   से ,
जो  भाग -भाग कर जाकर,
 उन ऊँचे -ऊँचे पहाड़ो से टकराकर ,
बताना चाहती हैं ,  कि  वो जिंदगी को पा\चुका है ,
तभी तो वो इतना शांत है ,इतना शांत  ......

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

अहसास 33 - चक्रव्यू


यह जो मैं  लिखता हूँ कविता कहीं पर,
कुछ रचता हूँ नया संगीत में ,
बनाता हूँ कोई स्केच किसी कोरे कागज पे,
या फिर लिख देता हूँ ढेर सारे कागज किसी भी विषय पर।

शायद इसलिए क्योंकि
मेरे अंदर छुपा हुआ है एक इंसान
कहीं दूर तक पैठ बनाये हुए ,
जिसकी ख्वाइशें हैं बेहद ,
जो चाहता है उड़ना आसमान में,
 और छूना  हिमालय की चोटियों को ,
 चाहता है पाना सागर की तह को निसंकोच ,

मगर सब कुछ तो संभव नहीं हैं  इस जहाँ में ,
 जैसे सारी चाहतें नहीं हैं पूरी होती एक जन्म में ,
फिर तो लेने पड़ेंगे मुझे कई जन्म ,

मगर यह भी तो एक ख्याइश ही है
शायद यह एक चक्रव्यू  है इन ख्वाइशों  का ,
जिसको भेद पाना मुझ अभिमन्यु को नहीं आता ,
काश कोई  चाणक्य मुझे भी  मिल जाता ,
और बता देता इसे भेदने का रहस्य।