मंगलवार, 20 सितंबर 2016

अहसास 41 -तुम ही हो........

आजकल कभी कभी मैं खुद से ही पूछने लगा  हूँ ,
कहीं मैं  तुमसे वाकई प्यार  तो नहीं करने लगा हूँ ?
या फिर ,अपने दिल को  यूँ ही बस बहलाने लगा हूँ ?

रात के सन्नाटे को चीरकर , तुम्हारी यादे जब ,
मेरे दिल के किसी कोने को जोरो से  झंझोड़ती हैं ,
और मुझे उस गहरी नींद के मीठे -मीठे सपनो के हिचकौलो से  ,
खींच - निकालकर  झटके से बाहर लातीं हैं ,
तो मैं यकायक ही चौंक कर उठ जाता हूँ ,
और अपने हाथ पे  चिकोटी काटकर ,
खुद को यह अहसास दिलाने की कोशिश करता हूँ
कि यह  सपना था ,हकीकत नहीं ,

पर  क्या तुम इसको मानोगी ?
मुझे पक्का मालूम है ,तुम नाही  कहोगी ,
पर मैं भी  क्या करूँ ,
शायद .... तुमको समझा ही   न पाऊं ,
मेरी इन सरफिरी सी  बातों को सुनकर ,
तुम नाराज़ यकीनन  ही  होगी मुझसे ,
और फिर मन ही मन गुस्सा निकल रही होगी ,
अपनी उँगलियों से कागजो को मोड़ते हुए ,
या फिर कलम से उन पर कुछ भी उल्टा सीधा बनाते हुये ,
या फिर कहीं पर भी मेरा  नाम लिख- लिख ,
खुद ही बार बार काट रही होगी ,

काश मैं तुमको समझा  पाता ,
तुम्हारी आँखों की गहराई में झांककर ,
उन सागरों की तह को पा  पाता ,
उनमें  बिखरे हए उन ढेर सारे मोतियों को चुन पाता ,
क्योंकि मैं नहीं चाहता वो मोती आंसुओं का रूप लेकर ,
उन गुलाबी मखमली से गालों पर लुढककर   ,
मुझको  मेरी उस हसीन तनहाई  से जुदा  कर दें ,

तुम सुन रहीं हो ना ,मेरी बातों को गौर से  ,
या फिर उसे मेरा पागलपन या  दीवानगी समझकर
हवा में पतंग की तरह  बेझिझक  उड़ा  रही हो ,
मैं यह जानता हूँ कि  तुम यह दिखाने की असफल कोशिश
करती रहती हो ,
पर हर बार  ये ,कमबख्त दिल ,यही  कहता रहता  है
कि  यह सही नहीं है,
क्योंकि तुम जानती हो मुझे ,मुझसे भी अच्छी तरह ,
आखिर ये तुम ही हो जो मुझसे प्यार करती हो बेइंतिहा, बेसबब   ........

written in 2000








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