आजकल कभी कभी मैं खुद से ही पूछने लगा हूँ ,
कहीं मैं तुमसे वाकई प्यार तो नहीं करने लगा हूँ ?
या फिर ,अपने दिल को यूँ ही बस बहलाने लगा हूँ ?
रात के सन्नाटे को चीरकर , तुम्हारी यादे जब ,
मेरे दिल के किसी कोने को जोरो से झंझोड़ती हैं ,
और मुझे उस गहरी नींद के मीठे -मीठे सपनो के हिचकौलो से ,
खींच - निकालकर झटके से बाहर लातीं हैं ,
तो मैं यकायक ही चौंक कर उठ जाता हूँ ,
और अपने हाथ पे चिकोटी काटकर ,
खुद को यह अहसास दिलाने की कोशिश करता हूँ
कि यह सपना था ,हकीकत नहीं ,
पर क्या तुम इसको मानोगी ?
मुझे पक्का मालूम है ,तुम नाही कहोगी ,
पर मैं भी क्या करूँ ,
शायद .... तुमको समझा ही न पाऊं ,
मेरी इन सरफिरी सी बातों को सुनकर ,
तुम नाराज़ यकीनन ही होगी मुझसे ,
और फिर मन ही मन गुस्सा निकल रही होगी ,
अपनी उँगलियों से कागजो को मोड़ते हुए ,
या फिर कलम से उन पर कुछ भी उल्टा सीधा बनाते हुये ,
या फिर कहीं पर भी मेरा नाम लिख- लिख ,
खुद ही बार बार काट रही होगी ,
काश मैं तुमको समझा पाता ,
तुम्हारी आँखों की गहराई में झांककर ,
उन सागरों की तह को पा पाता ,
उनमें बिखरे हए उन ढेर सारे मोतियों को चुन पाता ,
क्योंकि मैं नहीं चाहता वो मोती आंसुओं का रूप लेकर ,
उन गुलाबी मखमली से गालों पर लुढककर ,
मुझको मेरी उस हसीन तनहाई से जुदा कर दें ,
तुम सुन रहीं हो ना ,मेरी बातों को गौर से ,
या फिर उसे मेरा पागलपन या दीवानगी समझकर
हवा में पतंग की तरह बेझिझक उड़ा रही हो ,
मैं यह जानता हूँ कि तुम यह दिखाने की असफल कोशिश
करती रहती हो ,
पर हर बार ये ,कमबख्त दिल ,यही कहता रहता है
कि यह सही नहीं है,
क्योंकि तुम जानती हो मुझे ,मुझसे भी अच्छी तरह ,
आखिर ये तुम ही हो जो मुझसे प्यार करती हो बेइंतिहा, बेसबब ........
written in 2000
कहीं मैं तुमसे वाकई प्यार तो नहीं करने लगा हूँ ?
या फिर ,अपने दिल को यूँ ही बस बहलाने लगा हूँ ?
रात के सन्नाटे को चीरकर , तुम्हारी यादे जब ,
मेरे दिल के किसी कोने को जोरो से झंझोड़ती हैं ,
और मुझे उस गहरी नींद के मीठे -मीठे सपनो के हिचकौलो से ,
खींच - निकालकर झटके से बाहर लातीं हैं ,
तो मैं यकायक ही चौंक कर उठ जाता हूँ ,
और अपने हाथ पे चिकोटी काटकर ,
खुद को यह अहसास दिलाने की कोशिश करता हूँ
कि यह सपना था ,हकीकत नहीं ,
पर क्या तुम इसको मानोगी ?
मुझे पक्का मालूम है ,तुम नाही कहोगी ,
पर मैं भी क्या करूँ ,
शायद .... तुमको समझा ही न पाऊं ,
मेरी इन सरफिरी सी बातों को सुनकर ,
तुम नाराज़ यकीनन ही होगी मुझसे ,
और फिर मन ही मन गुस्सा निकल रही होगी ,
अपनी उँगलियों से कागजो को मोड़ते हुए ,
या फिर कलम से उन पर कुछ भी उल्टा सीधा बनाते हुये ,
या फिर कहीं पर भी मेरा नाम लिख- लिख ,
खुद ही बार बार काट रही होगी ,
काश मैं तुमको समझा पाता ,
तुम्हारी आँखों की गहराई में झांककर ,
उन सागरों की तह को पा पाता ,
उनमें बिखरे हए उन ढेर सारे मोतियों को चुन पाता ,
क्योंकि मैं नहीं चाहता वो मोती आंसुओं का रूप लेकर ,
उन गुलाबी मखमली से गालों पर लुढककर ,
मुझको मेरी उस हसीन तनहाई से जुदा कर दें ,
तुम सुन रहीं हो ना ,मेरी बातों को गौर से ,
या फिर उसे मेरा पागलपन या दीवानगी समझकर
हवा में पतंग की तरह बेझिझक उड़ा रही हो ,
मैं यह जानता हूँ कि तुम यह दिखाने की असफल कोशिश
करती रहती हो ,
पर हर बार ये ,कमबख्त दिल ,यही कहता रहता है
कि यह सही नहीं है,
क्योंकि तुम जानती हो मुझे ,मुझसे भी अच्छी तरह ,
आखिर ये तुम ही हो जो मुझसे प्यार करती हो बेइंतिहा, बेसबब ........
written in 2000
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