शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

अहसास 36 - कुछ जरा ......

भागते- भागते ,  बैठलें कुछ  जरा  ,
ये फिसलता समय , कस पकड़ लें जरा ,
आस की गांठ को ,थोड़ी ढीली करें ,
पोटली है मुक्कदर की खोलें जरा
भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........

कुछ तो ऐसा करें,  हो मजा ढेर सा
खुदबखुद ही लगे, है सवा सेर सा ,
दिखने में कुछ नहीं ,सुनने में हो सरल ,
चाहे  छोटा ही हो ,लगे बड़े  घेर सा
दोस्तो की तरह, दिल को खोलें जरा ,
थोड़ी उनसे कहें ,सुन लें उनको जरा।

भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........

बाँट लें जो मिलें , थोड़ा ही हो सही
जिसमें खुशियां मिलें ,काम होता वही
मंजिलों  से नज़र , न कभी भी हटे ,
करना जो भी पड़े ,तोड़ें -जोड़ें वही ,
अक्स जो है जहन में , छाप दें वो जरा
दुनियादारी की  छोड़ें , दिल की सुनलें जरा

भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........










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