शनिवार, 24 सितंबर 2016

अहसास 45 - पैग़ाम

चिड़ियों की चहचआहट ,
रस्ते पे चलती आहट
पानी की बहती  कलकल
पत्तो की सरसराहट

मिटटी की गीली  खूशबू
आसमाँ  की नीली छतरी
सूरज के चलते फिरते ,
धूप के रंग बदलते
बादलों की गड़गड़ाहट
पसीने की कड़वाहट

मस्ती भरी सुबह और कूदती फिरती शाम ,
बाँटती   रहती हर पल  यही एक ही पैगाम ,
जिंदगी है बड़ी बेशकीमती मेरे यार
जीलो इसे जी भरके ,करलो इसे प्यार
इससे पहले की हथेली से फिसल जाये ,
पकड़लो इसे कसके और करलो अपने मन का
बिना कुछ समझे , झिझके- रोके । 

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