रात को अकेले बैठे -बैठे ,
अपने ही ख्यालो से बातें करते - करते ,
मुझे दूर -दूर तक का सन्नाटा ,
और उस सन्नाटे को चीरते हुए ,
बारिश में वो झींगुरों की आवाजें ,
अचानक की कुछ कुरेदती सी लगीं ,
उलट पलट करके ,
किसी पुराने रिस्ते हुए जख्म को ,
जो अभी भी सूखा नहीं था ,
मैं भूल ही गया था ,कि मैं अकेला हूँ ,
कहाँ हूँ ? इतनी सारी आवाजें तो हैं ना ,
बारिश की जोरों से गूंजने वाली ,
टप- टप तो कभी छप -छप की आवाजें ,
बादल की गड़गड़ाहट,तो बिजली की कड़कड़ाहट ,
तेज हवाओं से खिड़की के खड़खड़ाहट ,
सड़क पे अचानक कुछ लोगों की
चलते -चलते बातें करते हुए ,
जोरों से खंखारने की,
धीरे- धीरे दूर चले जाने की आवाजें ,
चौकीदार की सीटी और डंडे को ,
जमीन पर पटकने की धम -धम की आवाजें ,
ख़ामोशी तो है ही नहीं ,
सिर्फ एक मैं हूँ जो अपने आप में ही खामोश है,
क्योंकि बोलने को कोई है ही नहीं ,
सिर्फ यह चंद कागज हैं ,
और उन पर चलती या मचलती यह कलम ,
जिनसे कभी कभी कुछ कह लेता हूँ,
या कुछ सुन लेता हूँ ,
पर यह ही तो तो काफी नहीं है ना ,
कोई और भी तो चाहिये ,
जिससे लड़ सकूँ , उन बातों पर ,
जो उसे पसंद हों और मुझे नापसंद ,
मेरे उस सुनसान रात के सन्नाटे में ,
जिसकी किसी बात पर जोर ठहाका मारकर हंसने पर,
ऊँगली अपने गीले होठों पे रखके हिश..... ... धीरे से.........
करके टोकने वाला हाड़ -मांस का ,
चलता -फिरता कोई संगदिल रहगुजर ,
जिसकी आँखों में नींद भरी होने के बावजूद ,
मैं जबरदस्ती अपने लिखे उलटे -सीधे पन्नो को ,
उसको पढ़कर सुना सकूं ,
और बार बार , कैसा है , पूछकर ,
बहुत अच्छा है , कहने पर मजबूर कर सकूँ ,
पर मैं न जाने क्यों हर बार ही यह भूल जाता हूँ ,
यह कोई सपना नहीं है ,
जिंदगी है ,
और जिंदगी ऐसी ही होती है।
written in 2000
अपने ही ख्यालो से बातें करते - करते ,
मुझे दूर -दूर तक का सन्नाटा ,
और उस सन्नाटे को चीरते हुए ,
बारिश में वो झींगुरों की आवाजें ,
अचानक की कुछ कुरेदती सी लगीं ,
उलट पलट करके ,
किसी पुराने रिस्ते हुए जख्म को ,
जो अभी भी सूखा नहीं था ,
मैं भूल ही गया था ,कि मैं अकेला हूँ ,
कहाँ हूँ ? इतनी सारी आवाजें तो हैं ना ,
बारिश की जोरों से गूंजने वाली ,
टप- टप तो कभी छप -छप की आवाजें ,
बादल की गड़गड़ाहट,तो बिजली की कड़कड़ाहट ,
तेज हवाओं से खिड़की के खड़खड़ाहट ,
सड़क पे अचानक कुछ लोगों की
चलते -चलते बातें करते हुए ,
जोरों से खंखारने की,
धीरे- धीरे दूर चले जाने की आवाजें ,
चौकीदार की सीटी और डंडे को ,
जमीन पर पटकने की धम -धम की आवाजें ,
ख़ामोशी तो है ही नहीं ,
सिर्फ एक मैं हूँ जो अपने आप में ही खामोश है,
क्योंकि बोलने को कोई है ही नहीं ,
सिर्फ यह चंद कागज हैं ,
और उन पर चलती या मचलती यह कलम ,
जिनसे कभी कभी कुछ कह लेता हूँ,
या कुछ सुन लेता हूँ ,
पर यह ही तो तो काफी नहीं है ना ,
कोई और भी तो चाहिये ,
जिससे लड़ सकूँ , उन बातों पर ,
जो उसे पसंद हों और मुझे नापसंद ,
मेरे उस सुनसान रात के सन्नाटे में ,
जिसकी किसी बात पर जोर ठहाका मारकर हंसने पर,
ऊँगली अपने गीले होठों पे रखके हिश..... ... धीरे से.........
करके टोकने वाला हाड़ -मांस का ,
चलता -फिरता कोई संगदिल रहगुजर ,
जिसकी आँखों में नींद भरी होने के बावजूद ,
मैं जबरदस्ती अपने लिखे उलटे -सीधे पन्नो को ,
उसको पढ़कर सुना सकूं ,
और बार बार , कैसा है , पूछकर ,
बहुत अच्छा है , कहने पर मजबूर कर सकूँ ,
पर मैं न जाने क्यों हर बार ही यह भूल जाता हूँ ,
यह कोई सपना नहीं है ,
जिंदगी है ,
और जिंदगी ऐसी ही होती है।
written in 2000
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