मंगलवार, 13 सितंबर 2016

अहसास 42 -नींद

नींद आ रही है , मुझको जोर से ,
आज जग गया  था मैं तो भोर से ,

सारे दिन तो भागता  मैं यूँ फिरा ,
सर पे डाले  बोझ ,यूँ उठा -गिरा ,
सुबह से हुई जो शाम न खबर ,
सो गया था राह में ,उठा शोर से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,

पैर क्या बेचारे कुछ भी बोलते ,
हो गए थे मोटे , थोड़े डोलते ,
गर्म पानी में  नमक सा डालकर ,
उनको डाला ,खुल गए वो पोर से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,

नींद में भी  तंग है दिन की कहीं ,
उठ गए , उड़ सी गयी कमबख्त ही ,
रात है सुनसान सी सनसन  करे।
बिखरी यादें है समेटे होड़ से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,
आज जग गया  था मैं तो भोर से।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें