रातें शर्मीली ,करवटों में लिटा के जरा ,
चंद लम्हे मिलें हैं ,सो लिपट कुछ जरा,
जोड़ें जाएँ यूँ सपनो को खींच खींच के ,
ले रज़ाई की गर्मी ओढ़ ले कुछ जरा ,
आसमानों से ऊंची ख्वाईशें हैं लिए ,
चल जमीनों की धुल छांट लें कुछ जरा ,
तेरे माथे पे झलकी शिकन क्यों भला ,
क्या कमी रह गयी , कुछ बता तो जरा ,
मेरे दिन रात घूमें तेरे इर्द -गिर्द ही ,
है मुहब्बत यह कैसी ,समझा कुछ जरा ,
चंद लम्हे मिलें हैं ,सो लिपट कुछ जरा,
जोड़ें जाएँ यूँ सपनो को खींच खींच के ,
ले रज़ाई की गर्मी ओढ़ ले कुछ जरा ,
आसमानों से ऊंची ख्वाईशें हैं लिए ,
चल जमीनों की धुल छांट लें कुछ जरा ,
तेरे माथे पे झलकी शिकन क्यों भला ,
क्या कमी रह गयी , कुछ बता तो जरा ,
मेरे दिन रात घूमें तेरे इर्द -गिर्द ही ,
है मुहब्बत यह कैसी ,समझा कुछ जरा ,