मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अहसास 32 -जिंदगी

अगर जिंदगी का गणित मुझे जरा सा आता ,
मैं भी एक अग्रणी में  गिना जाता ,

कुछ भी हासिल नहीं , हासिल ही नहीं जुड़ा ,
समय के साथ साथ ,मैं भी तो बढ़ जाता ,
अगर जिंदगी का गणित ..............

पलट के देख लें , हिम्मत नहीं हुई ,
लम्हात  कुछ ख़ुशी के , काश मैं भी गिन  पाता,
अगर जिंदगी का गणित ..............

चल तो रहा हूँ  यकीकन , पर हूँ वहीँ खड़ा ,
मंजिलों के रास्ते तय , मैं भी कर पाता ,
अगर जिंदगी का गणित .............

मौसमों के हिसाब से , हवायों के रुख पता नहीं
उम्र बढ़ रही हैं बस , मौसम से पता चल जाता,
अगर जिंदगी का गणित मुझे जरा सा आता ,
मैं भी एक अग्रणी में  गिना जाता।


अहसास 31 - मज़ा

 उस ठंडी दोपहर में ,खुली छत पे ,
बंद आँखों पे , खुली किताब ढाँपकर ,
कुछ मुरमुरी धुप में लेते हुए ,
अपने बदन को तापते हुये ,
कुछ गुनगुनाहट अपने आप ही होंठो से फूटने लगी,
कुछ चुभन  थी उसमे , पर कुछ ख़ुशी के छींटे भी थे ,
जो उसको सहला रहे थे ,

पास ही कुछ कबूतर गुड़ गुड़ कर रहे थे,
आपस में न जाने क्या कह रहे थे
एक दूसरे को छेड़ते - गुदगुदाते , चढ़ते ,
कभी उड़ते -कभी भाग रहे थे।

नीचे से कुछ बच्चो की जोर जोर से ,
कुछ न समझ में  आने वाली आवाजें आ रहीं थी ,
न जाने क्या खेल रहे थे ,
अपनी ही दुनिया में  बेसुध कूदते -फाँदते ,

कभी कभी लगता है ना ,
कि छोड़ देना चाहिये  सब कुछ ऐसे ही ,
अपने ही तरीके में  रमने के लिए
कुछ चीज ,कुछ हरकतें।
बेमतलब के ही अच्छी लगती हैं।

पर हम , न जाने क्यों ,हर चीज में ,
बेवजह ही बेसिरपैर का कारण  ढूंढ़ रहे होते हैं,
कुछ अजीब सा गणित बैठाते  हुये,
हासिल को जोड़ते , घटाते ,
अपने दोहरेपन और खोखलेपन को कुरेदते हुये ,
खुद ही को खोखला बना रहे होते हैं

अगर तुम अपनी सांसो को गिनो,
उसकी रफ़्तार को महसूस करके देखो ,
मेरा विशवास  करो , बड़ा ही मज़ा आएगा ,

कुछ नहीं है इसमें , बस एक बार खोके देखो,
यह मज़ा उस पच्चीसवें माले की
बड़ी सी बाहर निकली  हुई , ऊपर से खुली छत पे ,
लटके हुए झूले पे ,पैर  फैलाकर देखो ,
कितना छोटा लगता है ,बाकी सब ,
पर कितना अकेलापन ,

अज़ब मज़ाक है जिंदगी का
जीना है कुछ ऊपर, तो जगह तो मिलेगी ,
पर खोखलेपन के  साथ ,
और नीचे तंग सी भीड़ ही भीड़ ,
एक -दूसरे मे अच्छी सी मथी हुई ,


पर हाँ ,यहाँ जिस्मों की गर्माहट तो है ,
पंछियों की चहचहाट तो है ,
अनगिनत खुशबुओं के ढेर से ,
घुली -मिली सांसों में तीखापन लिए ,
कुछ नक़ाब में लिपटी हुई ,
कुछ खुलके खिलखिलाती हुई
हंसी तो है ,
इसका अपना ही है मज़ा ,

पंछी भी ऊपर और ऊपर ,
आसमान में उड़ते हुए बादल को छूकर ,
नीचे आ जाते हैं ,
पर हैं उनके , वो फिर से उड़ जाते हैं ,
मज़ा लेने के लिए
कभी न ख़तम होने वाला ,
बेमतलब -समझ में  न आने वाला मज़ा    ..

अहसास -30 -कसक

डरता हूँ कहीं  खुट्टल न हो जायूँ  ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक   कचोटे है ,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।

ऐसे ही  गुजर जाता, हर  दिन यूँ भागे सा ,
रातों को भी है न सुकूँ , काटे है  करवट सा ,
हों बंद , खुली ऑंखें , हर पल में यह झांके ,
आते- जाते पल का, चलचित्र चले ऐसा।

चलते फिरते हमको, अब लोग सिखाते हैं ,
छू आये हम  मंजिल , हमें गिनती गिनाते हैं  ,
हमने तो   समंदर की, गहराई को नापा है ,
यह आज हवाओं के, रुख को  समझाते है।

मन की बातें सुनना, अब छोड़ दिया कब से,
ऊँचे  उड़ने  की धुन ,को बांध  दिया जब  से ,
बचपन बोलें जिसको ,वो जूनून दबा डाला ,
खुलके हंसती  राहें ,हैं  मोड़ दिया तब से ,

डरता हूँ कहीं  खुट्टल न हो जायूँ  ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक  कचोटे है,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।


सोमवार, 22 अगस्त 2016

अहसास 29 -सपने

मैंने कुछ सपने बुन रक्खे हैं ,
अपनी मजबूरियों के तागो से,
अपने हालात के करघे पर ,
और अपनी हिम्मत व विश्वास की कारीगरी से ,

मैं जानता हूँ कि  मैं एक अच्छा कारीगर नहीं हूँ
कहीं कहीं कुछ गांठे सी पड़  गयी हैं ,
तो कहीं रंगों का मेल ही नहीं हो पाया है ,

पर इसमें भला मेरा क्या कुसूर ,
मुझे याद नहीं पड़ता ,
मुझे  यह सिखाया गया है
कि सपने बुनने कैसे हैं ,
कहाँ से शुरू करने हैं
और कहाँ पे ख़तम ,

हालात का करघा जैसे जैसे चलता गया ,
मैं बुनता चला गया ,
मुझे मालूम ही नहीं पड़ा
कि वक़्त केथपेड़े ,
कब सपनो को तोड़ते चले गए ,

और फिर कब दुबारा मैं उन्ही ,
टूटे -फूटे ,कच्चे, गांठ वाले तागों को ,
जोड़ जोड़ कर दुबारा उसी लगन से ,
सपने बुनता चला गया .......








अहसास -28 -कुछ तुम्हारे लिये .........

जिंदगी , छोड़ आया हूँ , तुम्हें शायद  कहीं पर,
पता नहीं चलते या फिर भागते हुये ,
किस मोड़ या फिर किस मुकाम पर  ,
याद नहीं पड़ता कहाँ पर ,

कभी मैं  भी हंसा  करता था,
खिलखिलाता था आसमान की ऊंचाइयों तक,
चाहता था उड़ना हवा की तरह दूर तलक ,
चाहता था कि  सारे जहाँ को समेट  लूँ अपनी बाँहों में ,
और दौड़कर चूमलूँ  पर्वत की उन ऊंचाइयों को,
जहाँ से पानी कलकल करता हुआ बहता चला आ रहा  है ,

चाहता था इतना बड़ा बनना ,
कि ढांप लूँ इस पृथ्वी को आसमां की तरह,
और चमकना इस सूरज की तरह,
प्रकाशमान करता हुआ सारे जहान को,

आज भी जब बारिश की बूंदे ,
कांच की खिड़की पर  गिरती हुई ,
टप -टप की आवाज़ करती हुई ,
दस्तक देतीं हैं दिल के किसी  कोने पर ,

मेरी उँगलियाँ बैचैन होने लगती  है 
फिर से कागज पर मचलने के लिए ,
कुछ लिखने के लिए ,
कुछ तुम्हारे लिये   ......... 







रविवार, 21 अगस्त 2016

अहसास 27 -कितनी खूबसूरत .........


उन हरी- हरी पहाड़ियों के पीछे से ,
जहाँ से सूरज निकलता है,
एक दुबली - पतली  सी लड़की,
जिसके बाल इतने घने और इतने काले हैं ,
जरा  से घुंघराले हैं ,
बकरी के तीन या शायद चार छौनो के पीछे ,
 भागती सी चली आ रही थी।

उसने बिलकुल सफ़ेद कपडे पहन रक्खे थे,
जिन पर कहीं -कहीं कुछ मिट्टी  के दाग ,
और कुछ खोंते से लगे थे,

भागते- भागते वो हांफने सी लगी थी ,
पर मुंह ही मुंह में कुछ बोलती हुई ,
शायद उन छौनो पे गुस्सा निकलती हुई ,
लहराती सी पगडंडियों पर ,
भागती सी चली  आ रही थी।

उसके अनछुये से होंठो को देखकर लगता था ,
जैसे किसी ने शाम के ढलते हुये सूरज से
सिंदूरी रंग लेकर उनमे भर दिया हो,
उसके धूप से लाल हुये गालों पर ,
काली ,घुंघराले बालों की वो ,
सांप सी लहराती लटें,
उसकी नाक मे पड़ी वो चमकती  हुई सफ़ेद सी बाली ,
उसका बड़ा सा सफ़ेद दुपट्टा ,
जोकि कमबख्त संभलने में ही नहीं आ रहा था ,

उनके पीछे  भागते भागते
साँस सँभालते हुये ,
उलटे सीधे दुपट्टे को डालते हुये ,
सीने का उठना गिरना ,

शायद उसको भी यह गुमान नहीं था ,
कि वो कितनी खूबसूरत है..... कितनी  ......... .,,,  

अहसास -26 - माया

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह ,
धोखा है पग पग पे ,
बहता है रग रग में ,
चेहरे पे हर  एक चेहरा चढ़ा यह।

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह.

जंजीरें जो थी बांधी  तूने, उनको तोड़ दे,
राहों पे तू रुक न चलता रह ,राहें मोड़ दे ,
होठो की तिश्नगी ,बढ़ने जो लगी
 बेसब्र तू न बन ,सांसे जो भगी ,
तेरे भी है, पत्ते हाथ में ,तेरा भी वक़्त आएगा।

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह.


सच में ताकत है ऐसी  ,रोक न पाए कोई भी 
आंधी  तूफान से जा टकराये, जाने हैं यह सभी ,
गरजें है ऐसे की सागर  हिले है ,
पटके हैं पैर जैसे  धरती फटे है
यह है शुरुआत ,अब आयी घडी मुकाबले की।

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह.





अहसास 25 -इन्टरनेट

इन्टरनेट वाईफ़ाई कनेक्शन घर में जुड़ गया,
जाने रास्तो को छोड़ ,अनजानों पे मुड़ गया। 

फेसबुक पे कितने ही मेरे दोस्त बन गए,
व्हाट्सअप के ग्रुप भी नए, रोज खुल गए,
इंस्टाग्राम ,फ्लिकर पे भी अब फोटो शेयर  करूँ ,
ट्विटर के फॉलोवर  भी तो रोज बढ़ गए। 

उठते सुबह  ही  अपना स्टेटस अपडेट करूँ ,
जितने आएं मैसेज ,बिन पढ़े ही शेयर करूँ ,
विडियो शेयर करने  ढूंढे बैठूं ज्ञान विज्ञानं पे मैं , 
ऑनलाइन हर वक़्त रहने का कॉन्ट्रैक्ट मैं करूँ। 

दिनप्रीति दिन फॉलोवर मेरे  बढ़ने यूँ लगे ,
दिल की धड़कन से मेरे जुड़ने यूँ लगे ,
शेयर,लाइक करने में स्ट्रेटेजी वर्कआउट करूँ ,
गूगल पे  चर्चे मेरे , ज्यों ज्यों  बढ़ने  लगे। 

फुरसत की चिड़िया कहाँ फुर्र से उड़ गयी ,
दूरी वालों से कब से  नजदीकीयां जुड़ गयी ,
संग में जो रहते हैं उनसे बातें कब करूँ,
कोने बांटे बैठें उँगलियाँ ही मुड़ गयीं। 

पहले बाज़ार में जाकर सब कुछ मिलता था ,
बाजु की दुकान पे बैठा गल्ला हिलता था ,
घर में  बैठे बैठे  सब कुछ  अब मिल जाये ,
पहले पहल तो कितना लाइन में लगता था। 

अब तो अंदर से लेकर  बाहर  के कपडे तक ,
मोबाइल, किताबें ,खाने से सजने तक ,
एक ऊँगली के दम पे अब, सब कुछ मिलता है,
जो भी है नाम गिनाओ ,जाओगे तुम थक। 

इसके आगे क्या होगा  राम को है मालूम ,
उसकी  माया है चलती  ,हो जाएगी ग़ुम 
ये भी बदलेगा एक दिन  नया कुछ फिर आयेगा 
उसकी इच्छा पे निर्भर , सोचोगे क्या तुम। 

इन्टरनेट वाईफ़ाई कनेक्शन घर में जुड़ गया,
जाने रास्तो को छोड़ ,अनजानों पे मुड़ गया। 


शनिवार, 20 अगस्त 2016

अहसास -24 -बचपन

जब हम छोटे थे , 
दुनिया छोटी थी ,
खुशियां ढेरों थी ,
कम नहीं होती थीं ।  

क्या दिन थे वो भी यारो 
कह सकते काश बुलालो। 

गर्मी की  रात में छत पे ,
तारों को गिनते थे  सोते ,
चंदा से बातें कर कर ,
ठंडे झोंकों में  खोते। 

कटती पतंग के पीछे 
कूदे भागे फिरते थे
मांझा सद्दी के हाथोँ 
ऊँगली काटे फिरते थे। 

किस्से कहानी सुन सुन 
खुद को किरदार समझते ,
उन जैसा रुतबा लेके 
हर रोज नया कुछ  करते। 

मीठी  सिवइयों वाली 
चटपट  वाली थी रातें ,
चोरी पकड़ी जाती तो 
जोरो से  डांट थे खाते। 

अब दुनिया बड़ी हो गयी 
जंगल सी खड़ी हो गई ,
खुशियां ढूंढे फिरते हैं ,
खोई सी लड़ी हो गई ,

क्या दिन थे वो भी यारो 
कह सकते काश बुलालो। 


शनिवार, 13 अगस्त 2016

अहसास -23 - रेत का घऱ


रेत की दीवारों से घर को  बनाते हुये
छोटी छोटी खिड़कियों से  सजाते हुये ,
छत की मुँडेर पे कंगूरों को  बना ,
ऊँचे ऊँचे से   गुम्बज चढ़ाते  हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

कहते हैं कि  शरारत की  उम्र नहीं ,
बचपना करना कोई भी जुर्म नहीं ,
फिर भी डांटे थी खायी ,सही मार भी ,
थप्पड़ों की तो गिनती  भी भूली रही ,
पढ़ते पढ़ते हुए , सीढ़ी चढ़ते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

पेट की दौड़ में , फिर पड़े होड़ में ,
नीचे ऊपर  की गणित लगे जोड़ में ,
अब तो लगने लगा , न है माया , ना नाम
किसके चक्कर में हैं , ना सकूँ , ना है  राम ,
दिल की चाहत को जोरो से कसते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

ना तो दिल का किया ,सबको रुसवा किया ,
वक़्त के थे तक़ाज़े , ना  ही  शिक़वा किया ,
गर्दिशों में फंसे ,तन्हा घूमे फिरें ,
दोस्तों से भी न अब तो हैं बातें करें ,
सीखते हर सबक़,  रोज़ ही कुछ नया,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।



अहसास 22 - रात


रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े ,तारों से लगती ख़फ़ा।

थक गई है  लगे,भागते भागते ,
बादलों में छुपे चाँद को भांपते , 
थी हवा भी बड़ी ही  पुरजोर से ,
भागे फिरती रही हर एक छोर से ,
स्याह काले घने बादलों से लड़ी,
हाथ जोड़े  वो तारो के पीछे पड़ी ,
वो न माने  वो खुद  ही थे जो डरे
उनकी शामत ही आती जो होते खड़े,
खाती धोखे वो उनसे ही हर दफ़ा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।

रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।

फिर जगेगी वो कल एक नये रूप में ,
चमकेगी  जैसे  सूरज की धूप में ,
कुछ सुहानी, रूमानी समां बांधते ,
कूदते फाँदते  साये से   नाचते
होठों पे मुस्कुराती कलियाँ लिये ,
ख्याब हँसते हुये ,जिंदगी को जिये ,
जगमगाती हुई तारो से खेलती
चाँद भागे फिरे ,पीछे वो भागती ,
सारी बातें वो देगी  यूँ ही भुला ,
कुछ लगेगी नहीं वो इनसे खफ़ा।

रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।




अहसास 21 -क़िताबें


कांच के दरवाजे के पीछे से झांकती वो किताबें ,
बुलाती रहती  हैं मुझे बेइंतिहा बेसब्र नज़र से तकते हुए ,
बड़े दिन हो गए है ,उनके सफहों को पलटे हुए।

उनमें  लिखे शब्द चिल्लाते हुए ,
कूद कूद के जैसे बाहर ही ,निकल  आयेगे ,
और लड़ने लगेंगे खींच तान के मुझको।

जब भी मैं उनके  पास से गुजरता हूँ,
बाहरी हवा में  साँस लेने की उन सबमें  अचानक  ही,
न जाने कहाँ से ,एक  बैचैन हुड़क  सी  मच जाती है ,
सांसो की खुशबुयों  को कितना पहचानते हैं वो।

 समय का मिलना तो वैसे ही   दुश्वार हो  गया है ,
उनको  पढ़ने का तो   सवाल  ही  क्या है  आजकल ,
हाथों  में मोबाइल होता है,  या फिर पैरो पे लैपटॉप
उसी पे ऊँगलीयां  चलाकर ,
थोड़ा बहुत  पढ़ लेता हूँ ,भूख मिटाने को।

हद तो यह हो गयी है आजकल आदतों की
कि कलम दराज़ में मिलता ही नहीं  ,
कमबख्त  लिखने की  आदत ही   छूट गयी है,
पहले अंगूठे में गड्ढे पड़ जाते थे लिखने में ,
अब तो सारी  उँगलियों मिलबांट कर लिख पढ़ लेती हैं ,
तर्जनी और अंगूठे की  धौंस नहीं चलती किसीपे।

पर कागज, पुराने पीले पड़े ,कुछ मुड़े तुड़े ,सिमटे हुए ,
खुली जिल्द लिए, अपनी खुशबू से  ,
ज्यादा गहराई   और  जोर से बोलते हैं ,
कभी कोई उनपे अपना नाम तो कभी कोई फूल
बनाकर या फिर कोनो को मोड़कर ,
अपने पढ़ने की छाप छोड़ देता है।

बरको  के बीच कहीं उनके दिए फूल आज भी रखे होंगे ,
उनकी अनकही कहानियों को अपने दरमियां  समेटे हुये।