रेत की दीवारों से घर को बनाते हुये
छोटी छोटी खिड़कियों से सजाते हुये ,
छत की मुँडेर पे कंगूरों को बना ,
ऊँचे ऊँचे से गुम्बज चढ़ाते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।
कहते हैं कि शरारत की उम्र नहीं ,
बचपना करना कोई भी जुर्म नहीं ,
फिर भी डांटे थी खायी ,सही मार भी ,
थप्पड़ों की तो गिनती भी भूली रही ,
पढ़ते पढ़ते हुए , सीढ़ी चढ़ते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।
पेट की दौड़ में , फिर पड़े होड़ में ,
नीचे ऊपर की गणित लगे जोड़ में ,
अब तो लगने लगा , न है माया , ना नाम
किसके चक्कर में हैं , ना सकूँ , ना है राम ,
दिल की चाहत को जोरो से कसते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।
ना तो दिल का किया ,सबको रुसवा किया ,
वक़्त के थे तक़ाज़े , ना ही शिक़वा किया ,
गर्दिशों में फंसे ,तन्हा घूमे फिरें ,
दोस्तों से भी न अब तो हैं बातें करें ,
सीखते हर सबक़, रोज़ ही कुछ नया,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।
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