शनिवार, 13 अगस्त 2016

अहसास -23 - रेत का घऱ


रेत की दीवारों से घर को  बनाते हुये
छोटी छोटी खिड़कियों से  सजाते हुये ,
छत की मुँडेर पे कंगूरों को  बना ,
ऊँचे ऊँचे से   गुम्बज चढ़ाते  हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

कहते हैं कि  शरारत की  उम्र नहीं ,
बचपना करना कोई भी जुर्म नहीं ,
फिर भी डांटे थी खायी ,सही मार भी ,
थप्पड़ों की तो गिनती  भी भूली रही ,
पढ़ते पढ़ते हुए , सीढ़ी चढ़ते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

पेट की दौड़ में , फिर पड़े होड़ में ,
नीचे ऊपर  की गणित लगे जोड़ में ,
अब तो लगने लगा , न है माया , ना नाम
किसके चक्कर में हैं , ना सकूँ , ना है  राम ,
दिल की चाहत को जोरो से कसते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

ना तो दिल का किया ,सबको रुसवा किया ,
वक़्त के थे तक़ाज़े , ना  ही  शिक़वा किया ,
गर्दिशों में फंसे ,तन्हा घूमे फिरें ,
दोस्तों से भी न अब तो हैं बातें करें ,
सीखते हर सबक़,  रोज़ ही कुछ नया,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।



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