शनिवार, 20 अगस्त 2016

अहसास -24 -बचपन

जब हम छोटे थे , 
दुनिया छोटी थी ,
खुशियां ढेरों थी ,
कम नहीं होती थीं ।  

क्या दिन थे वो भी यारो 
कह सकते काश बुलालो। 

गर्मी की  रात में छत पे ,
तारों को गिनते थे  सोते ,
चंदा से बातें कर कर ,
ठंडे झोंकों में  खोते। 

कटती पतंग के पीछे 
कूदे भागे फिरते थे
मांझा सद्दी के हाथोँ 
ऊँगली काटे फिरते थे। 

किस्से कहानी सुन सुन 
खुद को किरदार समझते ,
उन जैसा रुतबा लेके 
हर रोज नया कुछ  करते। 

मीठी  सिवइयों वाली 
चटपट  वाली थी रातें ,
चोरी पकड़ी जाती तो 
जोरो से  डांट थे खाते। 

अब दुनिया बड़ी हो गयी 
जंगल सी खड़ी हो गई ,
खुशियां ढूंढे फिरते हैं ,
खोई सी लड़ी हो गई ,

क्या दिन थे वो भी यारो 
कह सकते काश बुलालो। 


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