जब हम छोटे थे ,
दुनिया छोटी थी ,
खुशियां ढेरों थी ,
कम नहीं होती थीं ।
क्या दिन थे वो भी यारो
कह सकते काश बुलालो।
गर्मी की रात में छत पे ,
तारों को गिनते थे सोते ,
चंदा से बातें कर कर ,
ठंडे झोंकों में खोते।
कटती पतंग के पीछे
कूदे भागे फिरते थे
मांझा सद्दी के हाथोँ
ऊँगली काटे फिरते थे।
किस्से कहानी सुन सुन
खुद को किरदार समझते ,
उन जैसा रुतबा लेके
हर रोज नया कुछ करते।
मीठी सिवइयों वाली
चटपट वाली थी रातें ,
चोरी पकड़ी जाती तो
जोरो से डांट थे खाते।
अब दुनिया बड़ी हो गयी
जंगल सी खड़ी हो गई ,
खुशियां ढूंढे फिरते हैं ,
खोई सी लड़ी हो गई ,
क्या दिन थे वो भी यारो
कह सकते काश बुलालो।
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