कांच के दरवाजे के पीछे से झांकती वो किताबें ,
बुलाती रहती हैं मुझे बेइंतिहा बेसब्र नज़र से तकते हुए ,
बड़े दिन हो गए है ,उनके सफहों को पलटे हुए।
उनमें लिखे शब्द चिल्लाते हुए ,
कूद कूद के जैसे बाहर ही ,निकल आयेगे ,
और लड़ने लगेंगे खींच तान के मुझको।
जब भी मैं उनके पास से गुजरता हूँ,
बाहरी हवा में साँस लेने की उन सबमें अचानक ही,
न जाने कहाँ से ,एक बैचैन हुड़क सी मच जाती है ,
सांसो की खुशबुयों को कितना पहचानते हैं वो।
समय का मिलना तो वैसे ही दुश्वार हो गया है ,
उनको पढ़ने का तो सवाल ही क्या है आजकल ,
हाथों में मोबाइल होता है, या फिर पैरो पे लैपटॉप
उसी पे ऊँगलीयां चलाकर ,
थोड़ा बहुत पढ़ लेता हूँ ,भूख मिटाने को।
हद तो यह हो गयी है आजकल आदतों की
कि कलम दराज़ में मिलता ही नहीं ,
कमबख्त लिखने की आदत ही छूट गयी है,
पहले अंगूठे में गड्ढे पड़ जाते थे लिखने में ,
अब तो सारी उँगलियों मिलबांट कर लिख पढ़ लेती हैं ,
तर्जनी और अंगूठे की धौंस नहीं चलती किसीपे।
पर कागज, पुराने पीले पड़े ,कुछ मुड़े तुड़े ,सिमटे हुए ,
खुली जिल्द लिए, अपनी खुशबू से ,
ज्यादा गहराई और जोर से बोलते हैं ,
कभी कोई उनपे अपना नाम तो कभी कोई फूल
बनाकर या फिर कोनो को मोड़कर ,
अपने पढ़ने की छाप छोड़ देता है।
बरको के बीच कहीं उनके दिए फूल आज भी रखे होंगे ,
उनकी अनकही कहानियों को अपने दरमियां समेटे हुये।
this is expressing todays scenario where we are forgetting books..........
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