शनिवार, 13 अगस्त 2016

अहसास 21 -क़िताबें


कांच के दरवाजे के पीछे से झांकती वो किताबें ,
बुलाती रहती  हैं मुझे बेइंतिहा बेसब्र नज़र से तकते हुए ,
बड़े दिन हो गए है ,उनके सफहों को पलटे हुए।

उनमें  लिखे शब्द चिल्लाते हुए ,
कूद कूद के जैसे बाहर ही ,निकल  आयेगे ,
और लड़ने लगेंगे खींच तान के मुझको।

जब भी मैं उनके  पास से गुजरता हूँ,
बाहरी हवा में  साँस लेने की उन सबमें  अचानक  ही,
न जाने कहाँ से ,एक  बैचैन हुड़क  सी  मच जाती है ,
सांसो की खुशबुयों  को कितना पहचानते हैं वो।

 समय का मिलना तो वैसे ही   दुश्वार हो  गया है ,
उनको  पढ़ने का तो   सवाल  ही  क्या है  आजकल ,
हाथों  में मोबाइल होता है,  या फिर पैरो पे लैपटॉप
उसी पे ऊँगलीयां  चलाकर ,
थोड़ा बहुत  पढ़ लेता हूँ ,भूख मिटाने को।

हद तो यह हो गयी है आजकल आदतों की
कि कलम दराज़ में मिलता ही नहीं  ,
कमबख्त  लिखने की  आदत ही   छूट गयी है,
पहले अंगूठे में गड्ढे पड़ जाते थे लिखने में ,
अब तो सारी  उँगलियों मिलबांट कर लिख पढ़ लेती हैं ,
तर्जनी और अंगूठे की  धौंस नहीं चलती किसीपे।

पर कागज, पुराने पीले पड़े ,कुछ मुड़े तुड़े ,सिमटे हुए ,
खुली जिल्द लिए, अपनी खुशबू से  ,
ज्यादा गहराई   और  जोर से बोलते हैं ,
कभी कोई उनपे अपना नाम तो कभी कोई फूल
बनाकर या फिर कोनो को मोड़कर ,
अपने पढ़ने की छाप छोड़ देता है।

बरको  के बीच कहीं उनके दिए फूल आज भी रखे होंगे ,
उनकी अनकही कहानियों को अपने दरमियां  समेटे हुये।








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