मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अहसास -30 -कसक

डरता हूँ कहीं  खुट्टल न हो जायूँ  ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक   कचोटे है ,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।

ऐसे ही  गुजर जाता, हर  दिन यूँ भागे सा ,
रातों को भी है न सुकूँ , काटे है  करवट सा ,
हों बंद , खुली ऑंखें , हर पल में यह झांके ,
आते- जाते पल का, चलचित्र चले ऐसा।

चलते फिरते हमको, अब लोग सिखाते हैं ,
छू आये हम  मंजिल , हमें गिनती गिनाते हैं  ,
हमने तो   समंदर की, गहराई को नापा है ,
यह आज हवाओं के, रुख को  समझाते है।

मन की बातें सुनना, अब छोड़ दिया कब से,
ऊँचे  उड़ने  की धुन ,को बांध  दिया जब  से ,
बचपन बोलें जिसको ,वो जूनून दबा डाला ,
खुलके हंसती  राहें ,हैं  मोड़ दिया तब से ,

डरता हूँ कहीं  खुट्टल न हो जायूँ  ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक  कचोटे है,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।


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