डरता हूँ कहीं खुट्टल न हो जायूँ ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक कचोटे है ,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।
ऐसे ही गुजर जाता, हर दिन यूँ भागे सा ,
रातों को भी है न सुकूँ , काटे है करवट सा ,
हों बंद , खुली ऑंखें , हर पल में यह झांके ,
आते- जाते पल का, चलचित्र चले ऐसा।
चलते फिरते हमको, अब लोग सिखाते हैं ,
छू आये हम मंजिल , हमें गिनती गिनाते हैं ,
हमने तो समंदर की, गहराई को नापा है ,
यह आज हवाओं के, रुख को समझाते है।
मन की बातें सुनना, अब छोड़ दिया कब से,
ऊँचे उड़ने की धुन ,को बांध दिया जब से ,
बचपन बोलें जिसको ,वो जूनून दबा डाला ,
खुलके हंसती राहें ,हैं मोड़ दिया तब से ,
डरता हूँ कहीं खुट्टल न हो जायूँ ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक कचोटे है,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक कचोटे है ,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।
ऐसे ही गुजर जाता, हर दिन यूँ भागे सा ,
रातों को भी है न सुकूँ , काटे है करवट सा ,
हों बंद , खुली ऑंखें , हर पल में यह झांके ,
आते- जाते पल का, चलचित्र चले ऐसा।
चलते फिरते हमको, अब लोग सिखाते हैं ,
छू आये हम मंजिल , हमें गिनती गिनाते हैं ,
हमने तो समंदर की, गहराई को नापा है ,
यह आज हवाओं के, रुख को समझाते है।
मन की बातें सुनना, अब छोड़ दिया कब से,
ऊँचे उड़ने की धुन ,को बांध दिया जब से ,
बचपन बोलें जिसको ,वो जूनून दबा डाला ,
खुलके हंसती राहें ,हैं मोड़ दिया तब से ,
डरता हूँ कहीं खुट्टल न हो जायूँ ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक कचोटे है,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें