उन हरी- हरी पहाड़ियों के पीछे से ,
जहाँ से सूरज निकलता है,
एक दुबली - पतली सी लड़की,
जिसके बाल इतने घने और इतने काले हैं ,
जरा से घुंघराले हैं ,
बकरी के तीन या शायद चार छौनो के पीछे ,
भागती सी चली आ रही थी।
उसने बिलकुल सफ़ेद कपडे पहन रक्खे थे,
जिन पर कहीं -कहीं कुछ मिट्टी के दाग ,
और कुछ खोंते से लगे थे,
भागते- भागते वो हांफने सी लगी थी ,
पर मुंह ही मुंह में कुछ बोलती हुई ,
शायद उन छौनो पे गुस्सा निकलती हुई ,
लहराती सी पगडंडियों पर ,
भागती सी चली आ रही थी।
उसके अनछुये से होंठो को देखकर लगता था ,
जैसे किसी ने शाम के ढलते हुये सूरज से
सिंदूरी रंग लेकर उनमे भर दिया हो,
उसके धूप से लाल हुये गालों पर ,
काली ,घुंघराले बालों की वो ,
सांप सी लहराती लटें,
उसकी नाक मे पड़ी वो चमकती हुई सफ़ेद सी बाली ,
उसका बड़ा सा सफ़ेद दुपट्टा ,
जोकि कमबख्त संभलने में ही नहीं आ रहा था ,
उनके पीछे भागते भागते
साँस सँभालते हुये ,
उलटे सीधे दुपट्टे को डालते हुये ,
सीने का उठना गिरना ,
शायद उसको भी यह गुमान नहीं था ,
कि वो कितनी खूबसूरत है..... कितनी ......... .,,,
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