रविवार, 6 सितंबर 2020
शनिवार, 6 जून 2020
रविवार, 3 मई 2020
Poetic talk -अहसास 74-माफ़ी...
माफ़ी
जाने अनजाने , आप इसे माने या ना माने ,
हालात की चकरी की उलझनो में फँसे,
वक्त की रफ़्तार को उम्र से पकड़ने की कोशिशों में धँसे ,
मैं समझता हूँ कि कहीं मैंने आपको आहत किया है ,
यक़ीन मानिये , मुझे उसका क़तई भी इल्म नहीं था ,
पता नहीं , मैं आपकी माफ़ी का हक़दार हूँ भी या नहीं ,
या आप मुझे कभी माफ़ कर पाएँगे भी क्या ?
परंतु आज़ मैं तहेदिल से आपसे माफ़ी माँगने की हिम्मत जुटा पाया हूँ ,
इस उधारी के बोझ के ढेरों संस्मरणों का विश्लेषण करते हुए थक गया हूँ ,
आगे देखूँ या वक्त की गहराईयों में डुबकी मार पीछे टटोलूँ , रुक गया हूँ ,
आगे बढ़ना ज़रूरत है , मेरे संग जुड़े उन लोगों की वजह से
जिन्हें मुझसे ढेर सारी आशाएँ हैं ,
पिछली ज़िंदगी कुरेदना ज़रूरत है मेरे चेतन- अचेतन मन की
जो अतीत को बार -बार मेरे सामने लाये हैं,
अजब कश्मकश है , सब वही जस का तस है ,
मैंने अहम, पहल,स्वार्थ तेरा-मेरा,ऊँचा - नीचा ,
सब उठाके ताक़ पे रखने का ठान लिया है ,
इस छोटी सी मुट्ठी से फिसलती ज़िंदगी की पतंग को
जीवन के नीले गगन पे कसके तान लिया है ,
दस साल बचपन , दस साल पढ़ाई,
दस साल मशक़्क़त , दस साल गढ़ाई,
फिर दस साल सोचे कि जम गए अब तो ,
पर ठहराव कहाँ माया है रची सब तो ,
अगली पीढ़ी का बचपन ,
और फिर वही , बदस्तूर सिलसिलेवार , ना रुकने वाली
बल्कि सौ गुना ज़्यादा रफ़्तार से सुसज्जित है सब तो ,
यक़ीन मानिये , इन सबके बीच भी ,आपको सोचता हूँ ,
रिश्तों पे बिन चाहे जम गयी धूल -गर्द को बार बार पोंछता हूँ ,
गाहे-बेगाहे , हर सम्भव कोशिशों में लगा रहता हूँ ,
वर्क माफ़िक़ चमकती पर्त लगाने की सोच में जगा रहता हूँ ,
इस माफ़ी माँगने से कमस्कम मैं अपने को तो समझा पाऊँगा ,
हँसते गाते ज़िंदगी को कसके गले तो मिल पाऊँगा ।
Connect Krishna BHATNAGR
https://www.youtube.com/krishbhatnagar27
https://twitter.com/krishnabhatnagr
https://www.facebook.com/krishnabhatnagr009/
Http://krishnabhatnagr.wordpress.com
https://www.instagram.com/krishnabhatnagr/
https://soundcloud.com/krishnabhatnagr
सोमवार, 30 मार्च 2020
Poetic talk - अहसास 72-आपकी फ़िक्र है मुझे ..
आपकी फ़िक्र है मुझे ,
पर आशा करता हूँ आप अच्छे ही होंगे ,
इस अनचाहे -अनजाने संकट के दरम्यान,
ख़्याल रखें अपने और अपनो का ,
ज़िंदादिल उन ढेर सारे सपनों का ,
घर में बंद , बाहर निकलने के पाबंद ,
अपनी बदली दिनचर्या और अदले -बदले कामों के बीच ,
धूँड धूँड के करते रहते होंगे अपनी भूली -भली आदतों को सींच ,
इक जमाने बाद ,सब एक संग इकट्ठे , परिवार में इतने समय तक ,
अंताक्षरी, योगा ,इंटर्नेट सर्फ़िंग ,घर की सफ़ाई ,बर्तन -कपड़ों की धुलाई ,
पेड़ों में पानी , हौज़ी और देर तलक WhatsApp -न्यूज़ चैनल ख़बरों की दिल लगाईं ,
थोड़ी घबराहट भी हो जाती है कभी - कभी ,क्योंकि सब रुक गया हैं ,
और पता नहीं कब तक रुका रहेगा यूँ ही ,
या फिर कब परवाज़ पकड़ेगा उसी तरह फिर से ,
पर जब मैं आपको कहता हूँ ,सतर्क रहें ,सुरक्षित रहें और संयम रखें
तो लगता है जैसे ख़ुद को भी ढाँढस बंधा रहा हूँ कहीं भीतर से ,
आशाएँ है , कोई है ! जिसको देनी है ,तभी तो वो देगा बदले में मुझे भी ,
प्रार्थना करता हूँ ईश्वर से सबकी रक्षा करे और कल्याण हो ।
Connect Krishna BHATNAGR
https://www.youtube.com/krishbhatnagar27
https://twitter.com/krishnabhatnagr
https://www.facebook.com/krishnabhatnagr009/
https://vm.tiktok.com/XaVsyK/
Http://krishnabhatnagr.wordpress.com
https://www.instagram.com/krishnabhatnagr/
https://soundcloud.com/krishnabhatnagr
शनिवार, 21 मार्च 2020
Poetic talk - अहसास 70-आज सुबह वाक़ई ख़ुशगवार है -22-03-2020
आज सुबह वाक़ई ख़ुशगवार है
चिड़ियों की चहचहाहट, हवा की सुगंध
इक ठहराव सीने में भर रही है
पता नहीं इतने कौए कहाँ से आ गए हैं आज
काओं काओं कर मैना से ताल मिला रहे है शायद
कहीं जाने की जल्दी नहीं है ,
आसमाँ साफ़ सुथरा दूर तलक, आँखों को कितना भला लग रहा है
गाड़ियों की चीखने चिल्लाने की आवाज़ें पे ,
पंछियों ने आज अपना क़ब्ज़ा कर लिया है दबाके ,
सड़कों ने भी आज कहीं जाना नहीं हैं ,
एकदम चुप सी लेटी हुईं हैं ,
कुत्ते बहुधा रात को ही चिल्लाते हैं
आज इस चुप्पी से घबराये से दिन में ही आपस में पूछ रहे हैं
सब ठीक तो है ?
यह गहमा -गहमी कहाँ टहलने निकल गयी बिन बताए
समय की सुई तो चल रही है उसी हिसाब से
पर आज देर हो रही की फ़िक्र को
ज़ोर से खींच के मानो कहीं दूर फेंक दिया है ,
मुरमुरी धूप में पैर फैलाके यूँ ही ख़ाली आसमाँ को ताकते
दिल की धड़कन में इक गहरी हूक़ सी उठ रही है ,
इक लम्बी साँस खींचकर ,अपने फेफड़ों में भरके ,आँखें बंद कर
इन आवाज़ों में छोड़ दिया अपनेआप को ,
बहने के लिए उस लहराती कूदती फाँदती नदी के शीतल पानी में ,
उन हरे भरे आकाश को चूमते पहाड़ों के बीच ,
जिसके किनारों पे झूमते दरख़्तों की डालियों पे
कुछ परिंदो के छोटे छोटे घर
पत्तियों की आड़ में लुके -छुपे हैं ,
दूर किसी मंदिर की मीठी घंटी की गूँज
पानी की कलकल में घुल कानो में चुहल कर रही है
सोचता हूँ यहीं ठहर जाऊँ अगर बस चले तो ,
पर इंसानी भूख भी मिटानी है , यही चक्र है ...
Krishna BHATNAGR
https://www.facebook.com/krishnabhatnagr009/
https://vm.tiktok.com/XaVsyK/
Http://krishnabhatnagr.wordpress.com
https://twitter.com/krishnabhatnagr
https://www.youtube.com/krishbhatnagar27
https://www.instagram.com/krishnabhatnagr/
https://soundcloud.com/krishnabhatnagr
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)