कभी कभी अचानक बैठे बैठे,
पता नहीं कब व क्यों,
मैं सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ,
कि मैं क्या कर रहा हूँ ,
या क्या कर पा रहा हूँ अपने साथ ,
या फिर अपने साथ जुड़े उन तमाम लोगों से साथ ,
जिनसे मेरी जड़ें जुडी हुई हैं कुछ उलझी हुई सी ,
जिन्होंने इस तरह जकड रखा है
कि मैं चाहकर भी हटा नहीं सकता ,
उस चक्र को ,जो विरासत में मिला हैं।
क्या मैं वाकई मे खुश हूं ?
या फिर ख़ुशी को ढूंढने की नाकाम कोशिश कर रहा हूं ,
या शायद मैं यह जानता ही नहीं हूँ ,
कि ख़ुशी आखिरकार किस चिड़िया का नाम हैं ,
या फिर कैसे और कहाँ मिलती है
जहाँ तक मुझे याद पड़ता है
लोग कहते हैं कि मैं हँसता बहुत हूँ ,
पर क्या हंसना ही ख़ुशी है ?
मैं नहीं मानता।
हो सकता है उन्हें खुलकर हंसने की आदत ही नहीं हो ,
या फिर डरते हों , यह सोचकर ,कि लोग क्या कहंगे ,
इतनी जोर से हँसता है ,
बिलकुल बच्चो की तरह।
आखिर अब वो बड़े हो चुके हैं ,
उन्हें जिंदगी के कुछ तौर -तरीकों को मानना है
जोकि उनका तथाकथित ,बकौल उनका, समाज सिखाता है ,
पर यह समाज, सिर्फ बंधन ही क्यों लगता है ,
यह मत करो , वो मत करो,
ऐसे मत बैठो,,बैसे बात मत करो ,
इसको ऐसे ही करना होता है ,हर बात पे क्यों करना है ,नहीं पूछते ,
खैर छोड़ो ...
असलियत में यह उन लोगों की जमात है ,
जिनकी परिभाषाएं , आदमी के वज़ूद को देखकर ,
बदल जाती हैं ,
लेकिन मेरी परिभाषा नहीं बदलती ,
तभी मैं अपने आप को कई बार बड़ा असहज सा पाता हूँ ,
या यूँ कह लीजिये ,कि गोया लोगो को मेरे साथ असहज सा लगता है ,
पर इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ,
मैं तो जानता हूँ, कि मेरी बात सुनी ही नहीं जाएगी ,
वो मानेंगे ही नहीं ,फिलहाल तो संख्या मे वो ही ज्यादा हैं ,
पर यह जरूरी तो नहीं कि जो ज्यादा लोग बोलें ,वो सही ही हो ,
मेरा मानना है कि वो अपने अनुभव से ऐसे बन गए है ,
उन्होंने अपने चारो ओर एक खोल सा पहन लिया है ,
जिसे वो चाहकर भी खोल नहीं पा रहें है ,
और अब ..... ,
अब तो शायद आदत सी हो चुकी है ,
उन्हें खुद ही पता नहीं है कि वो ऐसे कब और क्यों बन गए ,
यूँ ही चलते -भागते ,जिंदगी को बहुत पीछे छोड़ आएं है वो,
उनकी निगाह में जिंदगी ,
एक मजबूरी है ,जिम्मेदारी है
जिसमें बंधन है ,जो ख़ुशी का बिलकुल नहीं है ,
कम से कम उनको देखकर तो यह ही लगता है ,
कभी -कभी तो लगता है जैसे उनके परों को ,
किसी ने बांध रक्खा है ,
जकड रखा है ,उनकी इच्छायों को कसकरके ,
और अब तो वो,
उड़ने की कल्पना से ही घबरा जाते हैं ,
अगर गिर पड़े तो ,
जमीं ही ठीक है ,चोट तो कम लगेगी --------
written in 2000