बुधवार, 28 दिसंबर 2016

अहसास 54 - कुछ जरा .....

रातें  शर्मीली ,करवटों में लिटा के जरा ,
चंद लम्हे मिलें हैं ,सो लिपट कुछ  जरा,

जोड़ें जाएँ यूँ सपनो को खींच खींच के ,
ले रज़ाई की गर्मी ओढ़ ले कुछ जरा ,

आसमानों से ऊंची ख्वाईशें हैं लिए ,
चल जमीनों की धुल छांट लें कुछ जरा ,

तेरे माथे पे  झलकी शिकन क्यों भला ,
क्या कमी रह गयी , कुछ बता तो जरा ,

मेरे दिन रात घूमें तेरे इर्द -गिर्द ही ,
 है मुहब्बत यह कैसी ,समझा कुछ  जरा ,


मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

अहसास 52 - तेरा ख्याल आ गया......

कुरमुरी धुप तले ,आँगन में लेटे  हुए, तेरा ख्याल आ गया ,
बंद आँखों ने तसव्वुर किया ,खुमार आ गया ,
तेरा ख्याल आ गया ........ 

नादानियाँ कितने करें हैं ,लोग कहते थक गए,
तोहमतें तो हैं लाज़िमी, मुहब्बत का  जो नाम आ गया ,
तेरा ख्याल आ गया ........ 

कोशिशें नाकाम रहीं , उन बंदिशों को तोड़ने की ,सरासर ही,
इस जूनून के बुखार का क्या करें , फिर वही  सवाल आ गया,
तेरा ख्याल आ गया ........ 

हवाओं से ओस की नमी ले, रातें करे हैं बातें देर तक  ,
है खुशनुमा से यह मंज़र ,चाँद तारों को भी करार आ गया,
तेरा ख्याल आ गया ........ 

रोजमर्रा की जरूरतों के बोझ से दबा ,खुश हूँ  बेहद फिर भी ,
एक तेरा साथ  ही काफी है , मंज़िलों का दौर आ गया ,
तेरा ख्याल आ गया ........


शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

अहसास 51 -लालटेन -a mischievous dance song

तेरी ऑंखें हैं या लालटेन ,
मेरे दिल का चुरा लिया चैन ,
मुझे सूझे न कुछ , जले आग बिना बुझ
बजे दिमाग का है जो बैंड
तेरी ऑंखें हैं या लालटेन ,
मेरे दिल का चुरा लिया चैन

चाल है तेरी मतवारी यूँ  , दिल मेरा धड़काये ,
कितना रोकूँ सांसो को मैं ,यह तो बढ़ -बढ़ जाएं ,
मोटे -मोटे चितवन से जो बाण चलाये पुरजोर ,
तेरी ऑंखें हैं या लालटेन ,
मेरे दिल का चुरा लिया चैन  

बात करें तो, बोले क्या है, हमको समझ न आये ,
हम तो तेरी भोली सूरातिया में खो -खो जाये ,
पलक न झपके, ऐसे देखें, शर्माएं भर भर के
तेरी ऑंखें हैं या लालटेन ,
मेरे दिल का चुरा लिया चैन

अहसास -50 -जी ले जरा .......

जी ले जरा ,
इन आंसूओं को ,
पी ले जरा ,हंसी में मिला तू ,
यह दूरियां ,नज़दीकियां ,
बन जाएँगी , एक दिन जरूर ,
तू हौसला ,खुद पे यकीं,
न छोड़ना , लेके जूनून,
जी ले जरा........ जी ले  जरा  .....

धीरे -धीरे, यह आंच जो  दिल में तेरे, है जल रही ,
बुझने न  देना , देके हवा, चाहे जो कर , हर बार ही ,
थम जा जरा ,लपटों में  बदलेगी, एक दिन जरूर ,
तू हौसला ,खुद पे यकीं,
न छोड़ना , लेके जूनून,

जी ले जरा........ जी ले  जरा  ....

आसमां के ,नीले रंग जैसा, फैलेगा तेरा रंग
सूरज के जैसा ,चमकेगा ,तारों को लेके संग ,
चारो दिशाओं और पंच  तत्वों से मिलके गूंजे जरूर ,
तू हौसला ,खुद पे यकीं,
न छोड़ना , लेके जूनून,
जी ले जरा........ जी ले  जरा  ..... 

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

अहसास 49- नाराज


तुम अगर  नाराज भी होते हो, तो अच्छा लगता है ,
उस खलिश के बाद प्यार, फिर  से नया सा  लगता है.
तुम अगर  नाराज भी...................

तुम एक सुरूर हो ,जूनून हो , दीवानगी की तह तक ,
तुम्हे बैठाके करीब, महसूस करें अच्छा सा  लगता है. ,
तुम अगर  नाराज भी   ......

कोई वजह तो होनी चाहिए ख्यालो में आने को ,
खुशबू बदन की महके हैं यूँ कि अच्छा सा  लगता है. ,
 तुम अगर  नाराज भी  ......

तुम्हारी आँखों में क्यों उमड़ा एक सैलाब सा भर है ,
मैं उनमे डूब जाऊँ  उम्र भर ,अच्छा सा  लगता है.
तुम अगर  नाराज भी   ......

तुम्हारा यूँ चिपटना और दुबकना आहटों पे हर ,
डराना धोखे से ,रूठना- मनाना ,अच्छा ,सा  लगता है.
 तुम अगर  नाराज भी  ......

शनिवार, 26 नवंबर 2016

अहसास 48 -थोड़ा हंस लें........

बैठे -बैठे यूँ ही चलो कुछ मुस्कुरा लें हम ,
थोड़ा हंस  लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
भागते  लम्हो को मुठ्ठी में पकड़कर बांधके ,
भरके ,चमकती रोशनी, जुगनू बनालें हम।
बैठे- बैठे यूँ ही चलो................

हाथ को रुखसार पे रख के क्यों सोचे देर तक ,
माथे की गहरी लकीरों को चढ़ा के भाल  तक
लाल स्याही से भरी आँखों को कुछ हंसालें हम,
थोड़ा हंस लें  खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
बैठे -बैठे यूँ ही चलो................


रेत के घर को बचाएगा भला तू कब तलक ,
यह तो उलझी भूलभुलैया ,काहे फिरता तू भटक.
ओस की बूँदे को गिनते ,रात हो जाएगी नम
थोड़ा हंस  लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
बैठे- बैठे यूँ ही चलो................

सुबहो से सहर तलक गिनता फिरे क्यों तू  समय
सांस फूली -चाल बहकी  धड़कने बढ़ती, झूमे ,
होश में बेहोश है ,थाम ले अपने कदम
थोड़ा हंस लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम.
बैठे -बैठे यूँ ही चलो................

बैठे- बैठे यूँ ही चलो कुछ मुस्कुरा लें हम ,
थोड़ा हंस  लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
भागते  लम्हो को मुठ्ठी में पकड़कर बांधके ,
भरके ,चमकती रोशनी, जुगनू बनालें हम।



बुधवार, 16 नवंबर 2016

अहसास 47 - दिल


दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा ,
खुद को ही सोचे सबसे बड़ा सा ,
किसको न मालूम  ,इसका इरादा ,
दुनियादारी से  ये तो   रहता  खफा, रहता खफा।

दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा,

छज्जे - मेहराबें देखके ये  तो, महलों के ख्याब बनाले
सब कुछ लगे है  इसको आसां , सपनो को ऐसे सजा ले ,
जब भी हो फुरसत , न कोई उल्फत
रंगीन चश्मा, लगाके है ये , नाचे फिरे हर दफा
दुनियादारी से ये तो  रहता खफा, रहता खफा।

दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा

पानी सा निश्चल, बह रौ मे जाये,उफनती नदी सा ये , कलकल ,
बिन पंख इतना ऊँचा उड़े है कि , पल में  मचा , कोई हलचल ,
जिद्दी बहुत है ,करे अपनी बकत है ,
सुनता नहीं है ,कितना भी बोलो , खाये है कितनी जफा,
दुनियादारी से  ये तो  रहता खफा, रहता खफा।

 दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा.


मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

अहसास 46 - एक दिन

यह भी उड़ जायेंगे एक दिन ,
खोजने मंजिलें अपनी  कहीं  कुछ इस तरह ,
पीछे रह जाएँगी कुछ ढूंढती -झूझती यादें  जरा ,

पंख फैलाएंगे नीले गगन के पार जाने को ,
दिल को धड़कायेंगे सपने सुहाने  अपने सजाने को ,
कुछ न कह पाएंगे  उस पल  , खुद को बहलायेंगे कहके यूँ चल,
हम न उड़ पाये तो ये तो उड़ें ऊँचे जरा।
यह भी उड़ जायेंगे एक दिन ,

ख्याबों की डोर से दिल की पतंग बंधी, उड़ जाएगी
फीके गीले शिकवे ,झूठी हंसी बस , रह जाएगी ,
उन चमकती निगाहों मे जगह ढूंढे जरा ,
यह भी उड़ जायेंगे एक दिन  ,

उनकी कोमल सोच को सींचना ही होगा
कोपलें फूटें तक सब्र रखना होगा
धुप और छांव का फर्क बोलें जरा ,

यह भी उड़ जायेंगे एक दिन ,
खोजने मंजिलें अपनी  कहीं  कुछ इस तरह ,
पीछे रह जाएँगी कुछ ढूंढती -झूझती यादें  जरा ,



शनिवार, 24 सितंबर 2016

अहसास 45 - पैग़ाम

चिड़ियों की चहचआहट ,
रस्ते पे चलती आहट
पानी की बहती  कलकल
पत्तो की सरसराहट

मिटटी की गीली  खूशबू
आसमाँ  की नीली छतरी
सूरज के चलते फिरते ,
धूप के रंग बदलते
बादलों की गड़गड़ाहट
पसीने की कड़वाहट

मस्ती भरी सुबह और कूदती फिरती शाम ,
बाँटती   रहती हर पल  यही एक ही पैगाम ,
जिंदगी है बड़ी बेशकीमती मेरे यार
जीलो इसे जी भरके ,करलो इसे प्यार
इससे पहले की हथेली से फिसल जाये ,
पकड़लो इसे कसके और करलो अपने मन का
बिना कुछ समझे , झिझके- रोके । 

अहसास 44 - सपने ....

मैंने कुछ सपने देखे है ,कैसे तुमको दिखलाऊँ ,
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है ....... 

यह ऊँची  उड़ती इन उमंगो को लगाम क्या बाँधू ,
इन थिरके क़दमों का करूँ क्या ,कैसे इनको साधू  ,
इन कांपते  होठों से उनको ,प्यार करूँ बतलाऊँ 
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है .......

तुम्हे देखा जबसे दिल में उठने लगीं है कितनी हिलोरें ,
बाँहों में  भर लो आके मुझको , मैं फूल हूँ तुम हों भौरें ,
इन कोमल कोमल पंखुड़ियों को खोल तुम्हें  समाऊं 
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है ....... ,

यह पुरवैया के साथ चलूँ मेरे चितवन चमके, गायें ,
सोई हों  या जागी हों  यह , मटक मटक इतरायें ,
खुशबू उनकी महसूस करूँ ,हर आहट से बहलाऊँ
इस चंचल मन की क्या कहूँ , यही सिखा सिखा बहलाऊँ ,
मैंने कुछ सपने देखे है .......

अहसास 42 - हरेक पल ........

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही ,
कश्मकश में  फँसी ,है भंवर में धंसी ,
थक गयी है लड़े कितना , ढह न जाये कहीं ,

आंच ऐसी लगी  ,सुलगी सुलगी फिरे ,
चूल्हा ठंडा पड़ा , पानी छींटे  गिरें  
राख उड़ है रही ,मुठ्ठी में बांध लूं ,
इससे पहले कि कुछ कसक रह जाये कहीं

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही ,

कोई नहीं गिला ,किसी से रखे है अब ,
उम्मीद की किरण,  गोया बुझ चुकी है जब 
हर इक सुबह वही है ,वही है शाम अब ,
कुछ भी नया नहीं है, राहों में घूमे वहीँ ,

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,

छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही 

शाना नहीं है कोई  सर , रखके रोलें हम
हाले दिल बताएं किसे , जुबां सीके रख्खे हम ,
बेपरवा सांसे तेज चलें ,लड़खड़ायें  कदम
रस्ते का पता है नहीं , मंजिल का पता  नहीं ,

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

अहसास 41 -तुम ही हो........

आजकल कभी कभी मैं खुद से ही पूछने लगा  हूँ ,
कहीं मैं  तुमसे वाकई प्यार  तो नहीं करने लगा हूँ ?
या फिर ,अपने दिल को  यूँ ही बस बहलाने लगा हूँ ?

रात के सन्नाटे को चीरकर , तुम्हारी यादे जब ,
मेरे दिल के किसी कोने को जोरो से  झंझोड़ती हैं ,
और मुझे उस गहरी नींद के मीठे -मीठे सपनो के हिचकौलो से  ,
खींच - निकालकर  झटके से बाहर लातीं हैं ,
तो मैं यकायक ही चौंक कर उठ जाता हूँ ,
और अपने हाथ पे  चिकोटी काटकर ,
खुद को यह अहसास दिलाने की कोशिश करता हूँ
कि यह  सपना था ,हकीकत नहीं ,

पर  क्या तुम इसको मानोगी ?
मुझे पक्का मालूम है ,तुम नाही  कहोगी ,
पर मैं भी  क्या करूँ ,
शायद .... तुमको समझा ही   न पाऊं ,
मेरी इन सरफिरी सी  बातों को सुनकर ,
तुम नाराज़ यकीनन  ही  होगी मुझसे ,
और फिर मन ही मन गुस्सा निकल रही होगी ,
अपनी उँगलियों से कागजो को मोड़ते हुए ,
या फिर कलम से उन पर कुछ भी उल्टा सीधा बनाते हुये ,
या फिर कहीं पर भी मेरा  नाम लिख- लिख ,
खुद ही बार बार काट रही होगी ,

काश मैं तुमको समझा  पाता ,
तुम्हारी आँखों की गहराई में झांककर ,
उन सागरों की तह को पा  पाता ,
उनमें  बिखरे हए उन ढेर सारे मोतियों को चुन पाता ,
क्योंकि मैं नहीं चाहता वो मोती आंसुओं का रूप लेकर ,
उन गुलाबी मखमली से गालों पर लुढककर   ,
मुझको  मेरी उस हसीन तनहाई  से जुदा  कर दें ,

तुम सुन रहीं हो ना ,मेरी बातों को गौर से  ,
या फिर उसे मेरा पागलपन या  दीवानगी समझकर
हवा में पतंग की तरह  बेझिझक  उड़ा  रही हो ,
मैं यह जानता हूँ कि  तुम यह दिखाने की असफल कोशिश
करती रहती हो ,
पर हर बार  ये ,कमबख्त दिल ,यही  कहता रहता  है
कि  यह सही नहीं है,
क्योंकि तुम जानती हो मुझे ,मुझसे भी अच्छी तरह ,
आखिर ये तुम ही हो जो मुझसे प्यार करती हो बेइंतिहा, बेसबब   ........

written in 2000








रविवार, 18 सितंबर 2016

अहसास 43 -मौसम ......

थोड़ा रूमानी आओ हो जायें ,
मौसमों के , संग हम भी ,
रंगीं मंजर  में, आओ खो जायें ,

थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , ......

तेरी आँखों में, उठ रही ये ,
कुछ कहानी, पढ़ रहा हूँ ,
होठ तेरे, बिन कहे ही ,
कह रहे क्या ,पढ़ रही हूँ ,
इन हवाओं के खुश तरन्नुम मे
बहते- बहते आओ बह जायें ,
थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , ......

बारिशों में संग भीगें ,
लिपटें -चिपटें , जलता है तन 
दहके अरमां , यूँ न बहका 
थाम ले तू   दिल की धड़कन ,
दिल की इस पल कुछ भी न  सुन ,
वक़्त यह यूँ हीं ,ऐसे थम जाये ,
थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , 

थोड़ा रूमानी आओ हो जायें 
मौसमों के , संग हम भी ,
रंगीं मंजर  में, आओ खो जायें ,
थोड़ा रूमानी आओ हो जायें , ...... 

अहसास 40 -तुम आओगी जरूर.......

चिनार के दरख्तों के पीछे से ,
सायं -सायं करती हुई आवाजो के बीच ,
जमीन के सूखे पड़े पत्तो पर चलने से ,
मदहोश संगीत पैदा करते हुए,
तुम आओगी जरूर।

मैं वहीँ रहगुजर में ,एक पेड के तने से ,
पीठ और सर को टिकाये ,
अपनी गीली हथेलियों को मसलते हुए ,
उस वीराने में ,तुम्हारा  इन्तजार कर रहा था ,

सर्द  भीगी  हवाओं में ,
किटकिटाते दांतो की आवाजों को रोकते  ,
और होठों को जोर से भींच दबाये हुये ,
 मोटे बेलगाम उड़ते हुए  दुपट्टे को
कसकर सर पर लपेटकर ,
सीने को  ढांपते और बालों को सँभालते हुए ,
देर रात तक जागकर रोने से ,
मोटी हुई लाल आँखों को झुकाकर ,
जिनमे अभी भी उतनी ही नमी है ,
 नज़रों को चुराते हुए ,
तुम आओगी जरूर।

उन ढेर सारी कही -अनकही ,
पतंग की डोर की तरह
उलझी हुई बातों को सुलझाने के लिए नहीं ,
बल्कि उन मुड़े- तुड़े बासी , कुछ पीले -सफ़ेद कागजो ,
और कुछ  तस्वीरों को वापिस लेने के लिए ,
जिनसे आज भी तुम्हारी वही  भीनी -भीनी  खुशबू आती है ,
जिनको तकिये के गलेफ के अंदर रखकर ,
कितनी अनगिनत रातें मैंने करवट बदलते हुए ,
और सोते -जागते गुजार दीं ,

थोड़ा पास आने पर कागजो पर लिखी कहानियों को ,
जब उन कांपते हुये हाथों ने थामा तो ,
उन लबलबाती आँखों की गहराईयों में ,
और उन लरजते हुए होठों पर ,
मुझे कितनी मजबूरियां और  गुजारिशें दिखाईं दी ,
वो लम्हे, जिंदगी शायद यूँ ही थम गई थी,
जो आज तक बस उसी तरह ,वहीँ थमी हुई है  ,,,,,,,,,      

written in 2000


मंगलवार, 13 सितंबर 2016

अहसास 42 -नींद

नींद आ रही है , मुझको जोर से ,
आज जग गया  था मैं तो भोर से ,

सारे दिन तो भागता  मैं यूँ फिरा ,
सर पे डाले  बोझ ,यूँ उठा -गिरा ,
सुबह से हुई जो शाम न खबर ,
सो गया था राह में ,उठा शोर से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,

पैर क्या बेचारे कुछ भी बोलते ,
हो गए थे मोटे , थोड़े डोलते ,
गर्म पानी में  नमक सा डालकर ,
उनको डाला ,खुल गए वो पोर से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,

नींद में भी  तंग है दिन की कहीं ,
उठ गए , उड़ सी गयी कमबख्त ही ,
रात है सुनसान सी सनसन  करे।
बिखरी यादें है समेटे होड़ से ,
नींद आ रही है , मुझको जोर से ,
आज जग गया  था मैं तो भोर से।

रविवार, 11 सितंबर 2016

अहसास 39 -डर

कभी कभी अचानक बैठे बैठे,
पता नहीं कब व क्यों,
मैं  सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ,
कि  मैं क्या कर रहा हूँ ,
या क्या कर पा   रहा हूँ अपने साथ ,
या फिर अपने साथ जुड़े  उन तमाम लोगों  से साथ ,
जिनसे मेरी जड़ें जुडी हुई हैं कुछ उलझी हुई सी ,
जिन्होंने इस तरह जकड रखा है
कि  मैं चाहकर भी हटा नहीं सकता ,
उस चक्र को ,जो विरासत में  मिला हैं।

क्या मैं वाकई मे खुश हूं ?
या फिर ख़ुशी को ढूंढने की नाकाम कोशिश  कर रहा हूं ,
या शायद मैं यह जानता ही नहीं हूँ ,
कि ख़ुशी आखिरकार  किस चिड़िया का नाम हैं ,
या फिर कैसे और  कहाँ मिलती है

जहाँ तक मुझे याद पड़ता है
लोग कहते हैं कि मैं हँसता बहुत हूँ ,
पर क्या हंसना ही ख़ुशी है ?
मैं नहीं मानता।
हो सकता है उन्हें खुलकर  हंसने की आदत ही नहीं हो ,
या फिर डरते हों , यह सोचकर ,कि  लोग क्या कहंगे ,
इतनी जोर से हँसता है ,
बिलकुल बच्चो की तरह।

आखिर अब वो बड़े हो चुके हैं ,
उन्हें जिंदगी के कुछ तौर -तरीकों  को मानना  है
जोकि उनका तथाकथित ,बकौल उनका, समाज सिखाता है ,
पर यह समाज, सिर्फ बंधन ही क्यों लगता है ,
यह मत करो , वो मत करो,
ऐसे मत बैठो,,बैसे बात मत करो ,
इसको ऐसे ही करना होता है ,हर बात पे क्यों करना है ,नहीं पूछते ,
खैर छोड़ो ...

असलियत में  यह  उन लोगों की जमात है ,
जिनकी   परिभाषाएं , आदमी के वज़ूद  को देखकर  ,
बदल जाती हैं ,
लेकिन मेरी परिभाषा नहीं बदलती ,
तभी मैं अपने आप को कई बार बड़ा असहज सा पाता हूँ ,
या यूँ  कह लीजिये ,कि  गोया लोगो को मेरे साथ असहज सा  लगता है ,
पर इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ,
मैं तो जानता हूँ, कि  मेरी बात  सुनी ही नहीं जाएगी ,
वो मानेंगे ही नहीं ,फिलहाल  तो संख्या मे वो ही ज्यादा हैं ,
पर यह जरूरी तो नहीं कि जो ज्यादा लोग बोलें ,वो सही ही  हो ,
मेरा मानना  है कि वो अपने अनुभव से ऐसे बन गए है ,
उन्होंने अपने चारो ओर एक खोल सा पहन लिया है ,
जिसे वो चाहकर भी खोल नहीं पा रहें है ,
और अब  ..... ,
अब तो शायद आदत सी हो चुकी  है ,
उन्हें खुद ही पता नहीं है कि वो ऐसे कब और क्यों बन गए ,
यूँ ही चलते -भागते ,जिंदगी को बहुत पीछे छोड़ आएं है वो,

उनकी निगाह में जिंदगी ,
एक मजबूरी है ,जिम्मेदारी है
जिसमें बंधन है ,जो ख़ुशी का बिलकुल नहीं है ,
कम से कम उनको देखकर तो यह ही लगता है ,
कभी -कभी तो लगता है जैसे उनके परों को ,
किसी ने बांध रक्खा है ,
जकड रखा है ,उनकी इच्छायों को कसकरके ,
और अब तो वो,
 उड़ने की कल्पना से ही  घबरा जाते हैं ,
अगर गिर पड़े तो ,
जमीं ही ठीक है ,चोट तो कम लगेगी --------     

written in 2000


अहसास 38 - यादें

रेत में छोटे-छोटे से घरोंदे बनाते -बनाते ,
मैं कब बड़ा हो गया ,
और बड़ी -बड़ी इमारतें बनानी शुरू कर दीं ,
मालूम  ही नहीं चला ,

बचपन की मीठी यादें ,
मैंने आज भी सजों रखीं हैं ,
जैसे यह , बस कल ही की बात हो,
रेत  से सने  कपड़ों को देखकर ,
कितनी डांटे  और थप्पड़ की मार ,
और  आज,
आज कौन है ?
यह देखने वाला ,या डांटने वाला ,
कि धूल या मिट्टी , कहाँ से लगाके आया हूँ ,

शाम को उन काले- काले  मजदूरों के बीच से  ,
 कपड़ों से कुछ ढके- कुछ अनढके से ,
उनके बच्चो  की घूरती आँखों से  छुप ,
सीमेंट ,रेत  और ईंटों के ढेर से ,
अपने आप को बचाते- बचाते ,
जब मैं  घर पहुंचता हूँ ,
तो उन अकेली सी सफ़ेद  दीवारों से ,
और उनपे लगी तस्वीरों से ,
ढेर सारी  शिकायतें सुनने को मिलती हैं ,
पर मैं क्या करुं ,
उनका अकेलापन दूर करते- करते ,
मैं खुद कितना अकेला हो गया ,
पता ही नहीं चला  ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

written in  2000

शनिवार, 10 सितंबर 2016

अहसास 37 - जिंदगी

रात को अकेले बैठे -बैठे ,
अपने ही ख्यालो से बातें करते - करते ,
मुझे दूर -दूर तक का सन्नाटा ,
और उस सन्नाटे को चीरते हुए ,
बारिश में वो झींगुरों की आवाजें ,
अचानक की कुछ कुरेदती सी लगीं ,
 उलट पलट करके ,
किसी पुराने रिस्ते हुए जख्म को ,
जो अभी भी सूखा नहीं था ,

मैं भूल ही गया था ,कि मैं अकेला हूँ ,
कहाँ हूँ ? इतनी सारी  आवाजें तो  हैं ना ,
बारिश की  जोरों से गूंजने वाली ,
 टप- टप तो कभी छप -छप की आवाजें ,
बादल की  गड़गड़ाहट,तो  बिजली की कड़कड़ाहट  ,
तेज हवाओं  से  खिड़की के खड़खड़ाहट ,
सड़क पे अचानक कुछ  लोगों की
चलते -चलते बातें करते हुए ,
जोरों से खंखारने की,
 धीरे- धीरे दूर चले जाने की आवाजें ,
चौकीदार की सीटी और डंडे को ,
जमीन पर पटकने की धम -धम की आवाजें ,

ख़ामोशी तो है ही नहीं ,
सिर्फ एक मैं हूँ जो अपने आप में ही  खामोश है,
क्योंकि बोलने को कोई है ही नहीं ,
सिर्फ यह चंद कागज हैं ,
और उन पर चलती या मचलती यह कलम ,
जिनसे कभी कभी कुछ कह लेता हूँ,
या कुछ सुन  लेता हूँ ,

पर यह ही तो  तो काफी नहीं है ना , 
कोई और भी तो चाहिये ,
जिससे लड़ सकूँ , उन बातों पर ,
जो उसे पसंद हों और मुझे नापसंद ,
मेरे उस सुनसान रात के सन्नाटे में ,
जिसकी किसी बात पर जोर ठहाका मारकर हंसने पर,
  ऊँगली अपने  गीले होठों पे रखके हिश..... ... धीरे से.........
 करके टोकने वाला हाड़ -मांस का ,
चलता -फिरता कोई संगदिल रहगुजर ,
जिसकी आँखों में  नींद भरी होने के बावजूद ,
मैं जबरदस्ती अपने लिखे उलटे -सीधे पन्नो को ,
उसको पढ़कर सुना सकूं ,
और बार बार , कैसा है , पूछकर ,
बहुत अच्छा है , कहने पर मजबूर कर सकूँ ,

पर मैं न जाने क्यों हर बार ही यह भूल जाता हूँ ,
यह कोई सपना नहीं है ,
जिंदगी है ,
और जिंदगी ऐसी ही होती है।

written in 2000 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

अहसास 36 - कुछ जरा ......

भागते- भागते ,  बैठलें कुछ  जरा  ,
ये फिसलता समय , कस पकड़ लें जरा ,
आस की गांठ को ,थोड़ी ढीली करें ,
पोटली है मुक्कदर की खोलें जरा
भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........

कुछ तो ऐसा करें,  हो मजा ढेर सा
खुदबखुद ही लगे, है सवा सेर सा ,
दिखने में कुछ नहीं ,सुनने में हो सरल ,
चाहे  छोटा ही हो ,लगे बड़े  घेर सा
दोस्तो की तरह, दिल को खोलें जरा ,
थोड़ी उनसे कहें ,सुन लें उनको जरा।

भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........

बाँट लें जो मिलें , थोड़ा ही हो सही
जिसमें खुशियां मिलें ,काम होता वही
मंजिलों  से नज़र , न कभी भी हटे ,
करना जो भी पड़े ,तोड़ें -जोड़ें वही ,
अक्स जो है जहन में , छाप दें वो जरा
दुनियादारी की  छोड़ें , दिल की सुनलें जरा

भागते- भागते  बैठलें कुछ  जरा     ...........










शनिवार, 3 सितंबर 2016

अहसास 35 -प्यार

प्यार ,एक ऐसा शब्द ,
जो अपने आप मे एक कहानी है ,
थोड़ी सुहानी  है , थोडा  रूमानी  है ,
जिसको आप जितने लोगों से पूछेंगे , उतने मतलब,
जो हो सकता है ,किसी से भी, कहीं भी,और कैसे भी ,
जिसमें  आँखों की नींद उड़ जाती है ,
भूख पता नहीं क्यों , अपने आप ही मिट जाती है ,
हर बात पे एक ,मीठी सी ,ख़ुशी मिलती है ,
और हर साँस में एक खुश्बू सी आती है ,

लोग बैठे बैठे शायर बन जाते हैं ,
और शब्दो को जोड़ते -जोड़ते ,
किसी भी  कागज पर ,कहीं  पे भी ,
न जाने कब और कैसे ,एक ग़ज़ल सी बन जाती है ,

जो शुरू हुआ था कभी ,
श्री-फरहाद , सोहनी -महिवाल ,लैला- मजनू ,
और रोमियो-जूलिएट से ,
जिसको समझने के लिये लोगों को जन्मों लग गये ,
जिसके ऊपर शायरों ने अनगिनत  पन्ने भर दिये ,
जिसकी वजह से इतिहास में तारीखें लिखी गयीं ,
जिसकी गहराई सागर की तलहटी से भी ज्यादा है ,
जिसमें डूबकर जब खो जाते हैं ,

जो सिर्फ देने की चीज़  है , लेने की नहीं ,
जिसमें आपको लगता है कि आप उड़'रहें हैं ,
उड़ रहें हैं , उन ऊंचाइयों के भी ऊपर ,
बिना परों के ही ,उस नीले आसमांनो  में  कहीं  ,
सफ़ेद,कुछ काले से , छितराये हुये ,बादलों के बीच ,

पर यह हर किसी को नहीं मिलता ,
और सबको इसी की तो तलाश है।

written in 2000

अहसास 34 -शांत

कल अचानक सड़क पे चलते -चलते ,
मुझको यकायक ही यह ख्याल आया,
कि चलो आज ,जिंदगी से ही मिलते चले जायें ,
जिंदगी ,जो शुरू हुई थी,आदम और इव से ,
पर अंत पता नहीं कहाँ है
शायद अनंत तक।

वैसे यह मालूम तो किसी को भी नहीं है ,
लेकिन इसकी खोज में सब , एक दूसरे के पीछे ,
पागलो की तरह भागे चले जा रहे हैं ,
कौन बीच में  गिर रहा है ,कैसे संभल रहा है ,
किसको फुरसत है ये देखने की ,
दिन ब दिन लोग बढ़ते जा रहें हैं ,
और  जगह कम होती जा रहीं है ,
थक-थक के गिर रहें हैं तरबतर ,
पर भागने की हौंस दिल में  बढ़ती ही जा रही है ,
पता नहींकिस ओर , और  क्या है इस मृगतृष्णा में।

वहीँ दूर , उन लहराती, ऊँची , खूबसूरत सी ,
आसमां को चूमती , पहाड़ों की वादियों   में ,
जहाँ ,या तो सिर्फ हरियाली है ,
या फिर ,सफ़ेद ,बिलकुल सफ़ेद ,
बर्फ की चादरों  का ओढा हुआ एक मंजर ,
जब वो व्यक्ति ,
जिसकी  मूंछे इतनी बड़ी  हैं कि ,
 दाढ़ी के बीच में  जाकर कहीं खो गयीं हैं ,
जिसके बालों का रंग ,दाढ़ी व मूंछों के रंग के साथ
बिलकुल सफ़ेद हो चूका है ,

पहाड़ों से घिरे उस मंदिर के दालान मे खड़े होकर ,
जब बर्फ के  रंग जैसे शंख को अपने होठों से लगाकर ,
अपने गालों में हवा भरकर ,
आसमान की ओर आँखों को कर ,
पुरजोर से  है बजाता  है ,
तो सारी वादियों  गूँज उठती हैं
उन  मिश्री घुली मीठी सी आवाजों   से ,
जो  भाग -भाग कर जाकर,
 उन ऊँचे -ऊँचे पहाड़ो से टकराकर ,
बताना चाहती हैं ,  कि  वो जिंदगी को पा\चुका है ,
तभी तो वो इतना शांत है ,इतना शांत  ......

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

अहसास 33 - चक्रव्यू


यह जो मैं  लिखता हूँ कविता कहीं पर,
कुछ रचता हूँ नया संगीत में ,
बनाता हूँ कोई स्केच किसी कोरे कागज पे,
या फिर लिख देता हूँ ढेर सारे कागज किसी भी विषय पर।

शायद इसलिए क्योंकि
मेरे अंदर छुपा हुआ है एक इंसान
कहीं दूर तक पैठ बनाये हुए ,
जिसकी ख्वाइशें हैं बेहद ,
जो चाहता है उड़ना आसमान में,
 और छूना  हिमालय की चोटियों को ,
 चाहता है पाना सागर की तह को निसंकोच ,

मगर सब कुछ तो संभव नहीं हैं  इस जहाँ में ,
 जैसे सारी चाहतें नहीं हैं पूरी होती एक जन्म में ,
फिर तो लेने पड़ेंगे मुझे कई जन्म ,

मगर यह भी तो एक ख्याइश ही है
शायद यह एक चक्रव्यू  है इन ख्वाइशों  का ,
जिसको भेद पाना मुझ अभिमन्यु को नहीं आता ,
काश कोई  चाणक्य मुझे भी  मिल जाता ,
और बता देता इसे भेदने का रहस्य।


मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अहसास 32 -जिंदगी

अगर जिंदगी का गणित मुझे जरा सा आता ,
मैं भी एक अग्रणी में  गिना जाता ,

कुछ भी हासिल नहीं , हासिल ही नहीं जुड़ा ,
समय के साथ साथ ,मैं भी तो बढ़ जाता ,
अगर जिंदगी का गणित ..............

पलट के देख लें , हिम्मत नहीं हुई ,
लम्हात  कुछ ख़ुशी के , काश मैं भी गिन  पाता,
अगर जिंदगी का गणित ..............

चल तो रहा हूँ  यकीकन , पर हूँ वहीँ खड़ा ,
मंजिलों के रास्ते तय , मैं भी कर पाता ,
अगर जिंदगी का गणित .............

मौसमों के हिसाब से , हवायों के रुख पता नहीं
उम्र बढ़ रही हैं बस , मौसम से पता चल जाता,
अगर जिंदगी का गणित मुझे जरा सा आता ,
मैं भी एक अग्रणी में  गिना जाता।


अहसास 31 - मज़ा

 उस ठंडी दोपहर में ,खुली छत पे ,
बंद आँखों पे , खुली किताब ढाँपकर ,
कुछ मुरमुरी धुप में लेते हुए ,
अपने बदन को तापते हुये ,
कुछ गुनगुनाहट अपने आप ही होंठो से फूटने लगी,
कुछ चुभन  थी उसमे , पर कुछ ख़ुशी के छींटे भी थे ,
जो उसको सहला रहे थे ,

पास ही कुछ कबूतर गुड़ गुड़ कर रहे थे,
आपस में न जाने क्या कह रहे थे
एक दूसरे को छेड़ते - गुदगुदाते , चढ़ते ,
कभी उड़ते -कभी भाग रहे थे।

नीचे से कुछ बच्चो की जोर जोर से ,
कुछ न समझ में  आने वाली आवाजें आ रहीं थी ,
न जाने क्या खेल रहे थे ,
अपनी ही दुनिया में  बेसुध कूदते -फाँदते ,

कभी कभी लगता है ना ,
कि छोड़ देना चाहिये  सब कुछ ऐसे ही ,
अपने ही तरीके में  रमने के लिए
कुछ चीज ,कुछ हरकतें।
बेमतलब के ही अच्छी लगती हैं।

पर हम , न जाने क्यों ,हर चीज में ,
बेवजह ही बेसिरपैर का कारण  ढूंढ़ रहे होते हैं,
कुछ अजीब सा गणित बैठाते  हुये,
हासिल को जोड़ते , घटाते ,
अपने दोहरेपन और खोखलेपन को कुरेदते हुये ,
खुद ही को खोखला बना रहे होते हैं

अगर तुम अपनी सांसो को गिनो,
उसकी रफ़्तार को महसूस करके देखो ,
मेरा विशवास  करो , बड़ा ही मज़ा आएगा ,

कुछ नहीं है इसमें , बस एक बार खोके देखो,
यह मज़ा उस पच्चीसवें माले की
बड़ी सी बाहर निकली  हुई , ऊपर से खुली छत पे ,
लटके हुए झूले पे ,पैर  फैलाकर देखो ,
कितना छोटा लगता है ,बाकी सब ,
पर कितना अकेलापन ,

अज़ब मज़ाक है जिंदगी का
जीना है कुछ ऊपर, तो जगह तो मिलेगी ,
पर खोखलेपन के  साथ ,
और नीचे तंग सी भीड़ ही भीड़ ,
एक -दूसरे मे अच्छी सी मथी हुई ,


पर हाँ ,यहाँ जिस्मों की गर्माहट तो है ,
पंछियों की चहचहाट तो है ,
अनगिनत खुशबुओं के ढेर से ,
घुली -मिली सांसों में तीखापन लिए ,
कुछ नक़ाब में लिपटी हुई ,
कुछ खुलके खिलखिलाती हुई
हंसी तो है ,
इसका अपना ही है मज़ा ,

पंछी भी ऊपर और ऊपर ,
आसमान में उड़ते हुए बादल को छूकर ,
नीचे आ जाते हैं ,
पर हैं उनके , वो फिर से उड़ जाते हैं ,
मज़ा लेने के लिए
कभी न ख़तम होने वाला ,
बेमतलब -समझ में  न आने वाला मज़ा    ..

अहसास -30 -कसक

डरता हूँ कहीं  खुट्टल न हो जायूँ  ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक   कचोटे है ,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।

ऐसे ही  गुजर जाता, हर  दिन यूँ भागे सा ,
रातों को भी है न सुकूँ , काटे है  करवट सा ,
हों बंद , खुली ऑंखें , हर पल में यह झांके ,
आते- जाते पल का, चलचित्र चले ऐसा।

चलते फिरते हमको, अब लोग सिखाते हैं ,
छू आये हम  मंजिल , हमें गिनती गिनाते हैं  ,
हमने तो   समंदर की, गहराई को नापा है ,
यह आज हवाओं के, रुख को  समझाते है।

मन की बातें सुनना, अब छोड़ दिया कब से,
ऊँचे  उड़ने  की धुन ,को बांध  दिया जब  से ,
बचपन बोलें जिसको ,वो जूनून दबा डाला ,
खुलके हंसती  राहें ,हैं  मोड़ दिया तब से ,

डरता हूँ कहीं  खुट्टल न हो जायूँ  ,
कुछ धार तो लगनी चाहिये ,
चुभे , कसक  कचोटे है,
उलझन तो सुलझनी चाहिये।


सोमवार, 22 अगस्त 2016

अहसास 29 -सपने

मैंने कुछ सपने बुन रक्खे हैं ,
अपनी मजबूरियों के तागो से,
अपने हालात के करघे पर ,
और अपनी हिम्मत व विश्वास की कारीगरी से ,

मैं जानता हूँ कि  मैं एक अच्छा कारीगर नहीं हूँ
कहीं कहीं कुछ गांठे सी पड़  गयी हैं ,
तो कहीं रंगों का मेल ही नहीं हो पाया है ,

पर इसमें भला मेरा क्या कुसूर ,
मुझे याद नहीं पड़ता ,
मुझे  यह सिखाया गया है
कि सपने बुनने कैसे हैं ,
कहाँ से शुरू करने हैं
और कहाँ पे ख़तम ,

हालात का करघा जैसे जैसे चलता गया ,
मैं बुनता चला गया ,
मुझे मालूम ही नहीं पड़ा
कि वक़्त केथपेड़े ,
कब सपनो को तोड़ते चले गए ,

और फिर कब दुबारा मैं उन्ही ,
टूटे -फूटे ,कच्चे, गांठ वाले तागों को ,
जोड़ जोड़ कर दुबारा उसी लगन से ,
सपने बुनता चला गया .......








अहसास -28 -कुछ तुम्हारे लिये .........

जिंदगी , छोड़ आया हूँ , तुम्हें शायद  कहीं पर,
पता नहीं चलते या फिर भागते हुये ,
किस मोड़ या फिर किस मुकाम पर  ,
याद नहीं पड़ता कहाँ पर ,

कभी मैं  भी हंसा  करता था,
खिलखिलाता था आसमान की ऊंचाइयों तक,
चाहता था उड़ना हवा की तरह दूर तलक ,
चाहता था कि  सारे जहाँ को समेट  लूँ अपनी बाँहों में ,
और दौड़कर चूमलूँ  पर्वत की उन ऊंचाइयों को,
जहाँ से पानी कलकल करता हुआ बहता चला आ रहा  है ,

चाहता था इतना बड़ा बनना ,
कि ढांप लूँ इस पृथ्वी को आसमां की तरह,
और चमकना इस सूरज की तरह,
प्रकाशमान करता हुआ सारे जहान को,

आज भी जब बारिश की बूंदे ,
कांच की खिड़की पर  गिरती हुई ,
टप -टप की आवाज़ करती हुई ,
दस्तक देतीं हैं दिल के किसी  कोने पर ,

मेरी उँगलियाँ बैचैन होने लगती  है 
फिर से कागज पर मचलने के लिए ,
कुछ लिखने के लिए ,
कुछ तुम्हारे लिये   ......... 







रविवार, 21 अगस्त 2016

अहसास 27 -कितनी खूबसूरत .........


उन हरी- हरी पहाड़ियों के पीछे से ,
जहाँ से सूरज निकलता है,
एक दुबली - पतली  सी लड़की,
जिसके बाल इतने घने और इतने काले हैं ,
जरा  से घुंघराले हैं ,
बकरी के तीन या शायद चार छौनो के पीछे ,
 भागती सी चली आ रही थी।

उसने बिलकुल सफ़ेद कपडे पहन रक्खे थे,
जिन पर कहीं -कहीं कुछ मिट्टी  के दाग ,
और कुछ खोंते से लगे थे,

भागते- भागते वो हांफने सी लगी थी ,
पर मुंह ही मुंह में कुछ बोलती हुई ,
शायद उन छौनो पे गुस्सा निकलती हुई ,
लहराती सी पगडंडियों पर ,
भागती सी चली  आ रही थी।

उसके अनछुये से होंठो को देखकर लगता था ,
जैसे किसी ने शाम के ढलते हुये सूरज से
सिंदूरी रंग लेकर उनमे भर दिया हो,
उसके धूप से लाल हुये गालों पर ,
काली ,घुंघराले बालों की वो ,
सांप सी लहराती लटें,
उसकी नाक मे पड़ी वो चमकती  हुई सफ़ेद सी बाली ,
उसका बड़ा सा सफ़ेद दुपट्टा ,
जोकि कमबख्त संभलने में ही नहीं आ रहा था ,

उनके पीछे  भागते भागते
साँस सँभालते हुये ,
उलटे सीधे दुपट्टे को डालते हुये ,
सीने का उठना गिरना ,

शायद उसको भी यह गुमान नहीं था ,
कि वो कितनी खूबसूरत है..... कितनी  ......... .,,,  

अहसास -26 - माया

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह ,
धोखा है पग पग पे ,
बहता है रग रग में ,
चेहरे पे हर  एक चेहरा चढ़ा यह।

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह.

जंजीरें जो थी बांधी  तूने, उनको तोड़ दे,
राहों पे तू रुक न चलता रह ,राहें मोड़ दे ,
होठो की तिश्नगी ,बढ़ने जो लगी
 बेसब्र तू न बन ,सांसे जो भगी ,
तेरे भी है, पत्ते हाथ में ,तेरा भी वक़्त आएगा।

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह.


सच में ताकत है ऐसी  ,रोक न पाए कोई भी 
आंधी  तूफान से जा टकराये, जाने हैं यह सभी ,
गरजें है ऐसे की सागर  हिले है ,
पटके हैं पैर जैसे  धरती फटे है
यह है शुरुआत ,अब आयी घडी मुकाबले की।

माया है ये,  तू न पाए, समझ  यह
दिखता  है कुछ और  सुनाता  फर्क यह.





अहसास 25 -इन्टरनेट

इन्टरनेट वाईफ़ाई कनेक्शन घर में जुड़ गया,
जाने रास्तो को छोड़ ,अनजानों पे मुड़ गया। 

फेसबुक पे कितने ही मेरे दोस्त बन गए,
व्हाट्सअप के ग्रुप भी नए, रोज खुल गए,
इंस्टाग्राम ,फ्लिकर पे भी अब फोटो शेयर  करूँ ,
ट्विटर के फॉलोवर  भी तो रोज बढ़ गए। 

उठते सुबह  ही  अपना स्टेटस अपडेट करूँ ,
जितने आएं मैसेज ,बिन पढ़े ही शेयर करूँ ,
विडियो शेयर करने  ढूंढे बैठूं ज्ञान विज्ञानं पे मैं , 
ऑनलाइन हर वक़्त रहने का कॉन्ट्रैक्ट मैं करूँ। 

दिनप्रीति दिन फॉलोवर मेरे  बढ़ने यूँ लगे ,
दिल की धड़कन से मेरे जुड़ने यूँ लगे ,
शेयर,लाइक करने में स्ट्रेटेजी वर्कआउट करूँ ,
गूगल पे  चर्चे मेरे , ज्यों ज्यों  बढ़ने  लगे। 

फुरसत की चिड़िया कहाँ फुर्र से उड़ गयी ,
दूरी वालों से कब से  नजदीकीयां जुड़ गयी ,
संग में जो रहते हैं उनसे बातें कब करूँ,
कोने बांटे बैठें उँगलियाँ ही मुड़ गयीं। 

पहले बाज़ार में जाकर सब कुछ मिलता था ,
बाजु की दुकान पे बैठा गल्ला हिलता था ,
घर में  बैठे बैठे  सब कुछ  अब मिल जाये ,
पहले पहल तो कितना लाइन में लगता था। 

अब तो अंदर से लेकर  बाहर  के कपडे तक ,
मोबाइल, किताबें ,खाने से सजने तक ,
एक ऊँगली के दम पे अब, सब कुछ मिलता है,
जो भी है नाम गिनाओ ,जाओगे तुम थक। 

इसके आगे क्या होगा  राम को है मालूम ,
उसकी  माया है चलती  ,हो जाएगी ग़ुम 
ये भी बदलेगा एक दिन  नया कुछ फिर आयेगा 
उसकी इच्छा पे निर्भर , सोचोगे क्या तुम। 

इन्टरनेट वाईफ़ाई कनेक्शन घर में जुड़ गया,
जाने रास्तो को छोड़ ,अनजानों पे मुड़ गया। 


शनिवार, 20 अगस्त 2016

अहसास -24 -बचपन

जब हम छोटे थे , 
दुनिया छोटी थी ,
खुशियां ढेरों थी ,
कम नहीं होती थीं ।  

क्या दिन थे वो भी यारो 
कह सकते काश बुलालो। 

गर्मी की  रात में छत पे ,
तारों को गिनते थे  सोते ,
चंदा से बातें कर कर ,
ठंडे झोंकों में  खोते। 

कटती पतंग के पीछे 
कूदे भागे फिरते थे
मांझा सद्दी के हाथोँ 
ऊँगली काटे फिरते थे। 

किस्से कहानी सुन सुन 
खुद को किरदार समझते ,
उन जैसा रुतबा लेके 
हर रोज नया कुछ  करते। 

मीठी  सिवइयों वाली 
चटपट  वाली थी रातें ,
चोरी पकड़ी जाती तो 
जोरो से  डांट थे खाते। 

अब दुनिया बड़ी हो गयी 
जंगल सी खड़ी हो गई ,
खुशियां ढूंढे फिरते हैं ,
खोई सी लड़ी हो गई ,

क्या दिन थे वो भी यारो 
कह सकते काश बुलालो। 


शनिवार, 13 अगस्त 2016

अहसास -23 - रेत का घऱ


रेत की दीवारों से घर को  बनाते हुये
छोटी छोटी खिड़कियों से  सजाते हुये ,
छत की मुँडेर पे कंगूरों को  बना ,
ऊँचे ऊँचे से   गुम्बज चढ़ाते  हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

कहते हैं कि  शरारत की  उम्र नहीं ,
बचपना करना कोई भी जुर्म नहीं ,
फिर भी डांटे थी खायी ,सही मार भी ,
थप्पड़ों की तो गिनती  भी भूली रही ,
पढ़ते पढ़ते हुए , सीढ़ी चढ़ते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

पेट की दौड़ में , फिर पड़े होड़ में ,
नीचे ऊपर  की गणित लगे जोड़ में ,
अब तो लगने लगा , न है माया , ना नाम
किसके चक्कर में हैं , ना सकूँ , ना है  राम ,
दिल की चाहत को जोरो से कसते हुये ,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।

ना तो दिल का किया ,सबको रुसवा किया ,
वक़्त के थे तक़ाज़े , ना  ही  शिक़वा किया ,
गर्दिशों में फंसे ,तन्हा घूमे फिरें ,
दोस्तों से भी न अब तो हैं बातें करें ,
सीखते हर सबक़,  रोज़ ही कुछ नया,
हम बड़े हो गए कब ,पता न चला।



अहसास 22 - रात


रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े ,तारों से लगती ख़फ़ा।

थक गई है  लगे,भागते भागते ,
बादलों में छुपे चाँद को भांपते , 
थी हवा भी बड़ी ही  पुरजोर से ,
भागे फिरती रही हर एक छोर से ,
स्याह काले घने बादलों से लड़ी,
हाथ जोड़े  वो तारो के पीछे पड़ी ,
वो न माने  वो खुद  ही थे जो डरे
उनकी शामत ही आती जो होते खड़े,
खाती धोखे वो उनसे ही हर दफ़ा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।

रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।

फिर जगेगी वो कल एक नये रूप में ,
चमकेगी  जैसे  सूरज की धूप में ,
कुछ सुहानी, रूमानी समां बांधते ,
कूदते फाँदते  साये से   नाचते
होठों पे मुस्कुराती कलियाँ लिये ,
ख्याब हँसते हुये ,जिंदगी को जिये ,
जगमगाती हुई तारो से खेलती
चाँद भागे फिरे ,पीछे वो भागती ,
सारी बातें वो देगी  यूँ ही भुला ,
कुछ लगेगी नहीं वो इनसे खफ़ा।

रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।




अहसास 21 -क़िताबें


कांच के दरवाजे के पीछे से झांकती वो किताबें ,
बुलाती रहती  हैं मुझे बेइंतिहा बेसब्र नज़र से तकते हुए ,
बड़े दिन हो गए है ,उनके सफहों को पलटे हुए।

उनमें  लिखे शब्द चिल्लाते हुए ,
कूद कूद के जैसे बाहर ही ,निकल  आयेगे ,
और लड़ने लगेंगे खींच तान के मुझको।

जब भी मैं उनके  पास से गुजरता हूँ,
बाहरी हवा में  साँस लेने की उन सबमें  अचानक  ही,
न जाने कहाँ से ,एक  बैचैन हुड़क  सी  मच जाती है ,
सांसो की खुशबुयों  को कितना पहचानते हैं वो।

 समय का मिलना तो वैसे ही   दुश्वार हो  गया है ,
उनको  पढ़ने का तो   सवाल  ही  क्या है  आजकल ,
हाथों  में मोबाइल होता है,  या फिर पैरो पे लैपटॉप
उसी पे ऊँगलीयां  चलाकर ,
थोड़ा बहुत  पढ़ लेता हूँ ,भूख मिटाने को।

हद तो यह हो गयी है आजकल आदतों की
कि कलम दराज़ में मिलता ही नहीं  ,
कमबख्त  लिखने की  आदत ही   छूट गयी है,
पहले अंगूठे में गड्ढे पड़ जाते थे लिखने में ,
अब तो सारी  उँगलियों मिलबांट कर लिख पढ़ लेती हैं ,
तर्जनी और अंगूठे की  धौंस नहीं चलती किसीपे।

पर कागज, पुराने पीले पड़े ,कुछ मुड़े तुड़े ,सिमटे हुए ,
खुली जिल्द लिए, अपनी खुशबू से  ,
ज्यादा गहराई   और  जोर से बोलते हैं ,
कभी कोई उनपे अपना नाम तो कभी कोई फूल
बनाकर या फिर कोनो को मोड़कर ,
अपने पढ़ने की छाप छोड़ देता है।

बरको  के बीच कहीं उनके दिए फूल आज भी रखे होंगे ,
उनकी अनकही कहानियों को अपने दरमियां  समेटे हुये।








रविवार, 31 जुलाई 2016

अहसास 20 -खोज

रुष्ट हूँ, संतुष्ट हूँ,
चेहरे से लगता पुष्ट हूँ,
पर क्या कहूँ ,ये  बंदिशे सहूँ
जिंदगी के माने क्या हैं ,
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

छोटे छोटे लम्हात से ,
बातें करते ,हालात से ,
कोशिश करूँ ,जी जान से ,
 घूरें  सभी ,   हैरान से ,
जो चाहूं हूँ , वो ही करूँ
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

रुष्ट हूँ, संतुष्ट हूँ,
चेहरे से लगता पुष्ट हूँ,
पर क्या कहूँ ,ये  बंदिशे सहूँ
जिंदगी के माने क्या हैं ,
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

ये तिश्नगी ,कैसे बुझे ,
कोई तो हल इसका सूझे ,
गर्मी सी है कुछ खून में
करता हूँ सब जूनून में
चलता रहूँ ,हँसता रहूँ
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।

रुष्ट हूँ, संतुष्ट हूँ,
चेहरे से लगता पुष्ट हूँ,
पर क्या कहूँ ,ये  बंदिशे सहूँ
जिंदगी के माने क्या हैं ,
घूमें फिरूँ ,खोजे फिरूं ।





अहसास 15 -स्पर्धा

पस्त हो गया,हालात से तृस्त हो गया,,
कोशिश छोड़ देनी चाहिए
समय की गति में खुला बहता छोड़ देना चाहिए ,
गति के विरोध में बहना,
ज्यादा सामर्थ्य और अनंत  कोशिशें ,
पर सामर्थ्य का पता तो किसी को भी नहीं हैं,
और कोशिशों का अंत भी कहीं नहीं है,
हमें हारना स्वीकार क्यों नहीं है
पर क्या  यह वाकई हारना ही है ,
हरोगे तो तब जब स्पर्धा में भागोगे ,
वो भी ऐसी जिसका आखिरी पड़ाव ही स्पर्धा है
जो बार बार खुद ही भाग  लेती है
और वो भी बिना बताये।

अहसास 19 - जीवन


किसको पता है  क्या  ,किसको खबर है ,
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है
कल की  फिकर कैसी ,जो होगा होयेगा ,
यारो के संग जीना , क्या कोई खोयगा

चलना है रीत यहाँ , चलना पड़ेगा ,
सुख दुख को मिल बाँट रहना पड़ेगा ,
जीने का रंग ढंग बदल अब ,जिधर  है।
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है

छींटे है प्यार के यह , होली इनसे खेल ले  ,
 गुलाल इनका बना ,जिंदगी में घोल ले ,
रंगीन कर ले सभी  , आज जो इधर है।
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है.

किसको पता है क्या   किसको खबर है ,
जीवन है खेल एक ,हर पल जबर है
कल की  फिकर कैसी ,जो होगा होयेगा ,
यारो के संग जीना , क्या कोई खोयगा


शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

अहसास 17 - रात


रात काली स्याही जैसी , आये है कुछ चुप से ,
सरगोशी कानो मे आके ,करती है गुप -चुप से।

जगमग जगमग तारे करते , आएंगे कुछ पल में ,
चांदनी छन छन आएगी , खेलेंगे बनके  दल में ,
पानी में परछाई लेके उतरे चाँद है चुप से.
सरगोशी कानो मे आके करता  है  गुप - चुप से ,
रात काली स्याही जैसी , आये है कुछ चुप से ,
सरगोशी कानो मे आके करती है  गुप - चुप से।

काली  बदरी पुरवाई के संग  कहीं उड़ जाएगी ,
जुगनू जैसे चमकेगी फिर , धरती खिल खिल जाएगी ,
नाचेगी फिर हर कोने में , चांदनी छुप -चुप से
सरगोशी कानो मे आके करती है गुप -चुप से 
रात काली स्याही जैसी , आये है कुछ चुप से ,
सरगोशी कानो मे आके करती है गुप - चुप से। 

रविवार, 24 जुलाई 2016

अहसास 16 - कारवाँ

यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,
खुद में ही तू एक कारवां।

चलचला तू चल, सोच न रुकने की
कल सुबह सूरज , उगेगा  सुनने की ,
उसकी तरह तू  ,भी है चमक कर ,
भागेंगा सरपट , यूँ आसमां में ,
यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,
खुद में ही तू एक कारवां।

सिलसिला ये चला , तो न रुक पायेगा ,
एक पल भी यहाँ, न तू थम पाएगा ,
 हर लम्हा होगा ,तेरी कहानी
चूमेगा मंजिल, रब की  जुबां  मे ,
यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,

खुद में ही तू एक कारवां

अहसास 14 -आखिर

चारपाई के पाये , गहरी परछाई के जैसे  साये ,
बांधो से कसके बुनी हुई ,गांठे हैं जैसे चुनी हुई ,
एक दिन येही काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

मंजिलें और कोशिशें सुन सुन थक गये अब   ,
मुरमुरा के यूँ ही यह ढह जायेंगी ,
न जाने किस काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

स्याही जैसे पक्के रंग की फैली, कुछ धुंदली सी ,
कुछ छापे छोड़ जायेंगी।
यादें बन के रह जाएँगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

जगती  से सोई आँखों तक खुलते खुलते ,
सपनो की किरमिच रह जाएगी ,
सिर्फ धूल  हाथ में आएगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी।

चारपाई के पाये , गहरी परछाई के जैसे  साये ,
बांधो से कसके बुनी हुई ,गांठे हैं जैसे चुनी हुई ,
एक दिन येही काम आयेंगी ,
बाकी सब छूट जायेंगी। 

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

अहसास -13 -इल्तिज़ा


सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो बेकस ,कितने  बेहाल ,
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो बेकस, कितने  बेहाल।

झुकी झुकी थी नज़र, भागते  वक़्त संग ,
कहनी थी दास्ताँ , जुबाँ थी ख़ुश्क - तंग ,
बिन बुलाई हवा ,कितनी पुरजोर थी,
चाहे उड़ा ले जाना , सारी यादों को संग।
खामोशियां ही वहां ,जो थी कुछ  बोलती,
पूछने को आये हमें कितने ही ख्याल ,
करने थे उनसे  हमें  अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो ,बेकस कितने  बेहाल ,

आंच सी  जल रही, किस कदर दरमियाँ ,
सुलगी  सी साँस में , दहकती गरमियाँ ,
राख में ढूंढ़ते  चिंगारी हो बची ,
नादाँ दिल से छुपा  , टूटता  आशियाँ
अंजान से बने , तिनको को जोड़ते
जख्मो पे मलहम ले  ,करते मलाल
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो ,बेकस कितने  बेहाल ,
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे ,
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

अहसास 12 - दो कदम

 दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तन्हा  मेरे ,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तनहा मेरे ,

होंठ बोलेंगे मगर, कुछ भी न तुम कह पाओगे ,
सरसरी नज़रों से बस तुम ताकते रह जाओगे ,
छूने से कतराओगे ,पास आओगे तन्हा मेरे
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तन्हा मेरे ,

सुखो पत्तो पे चलोगे ,साज से बज जायेंगे ,
उड़ते बालों को जो तुम  रुखसार से हटाओगे ,
बोलती आँखों से न कह पाओगे, तन्हा मेरे,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो, तन्हा मेरे ,

धूप की परछाई में पकड़ोगे कसके मुझको तुम ,
धड़कने बढ़ जाएँगी ,ऑंखें लहू सी होके  तुम ,
उँगलियों से उँगलियाँ कसते बड़ी तन्हां मेरे,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम, तन्हा मेरे..

दो कदम तुम साथ चल कर देख लो तन्हा मेरे , ,
खुशबू से घुल जाओगे सांसो में तुम ,तन्हा मेरे।






रविवार, 17 जुलाई 2016

अहसास 11 -इंतज़ार


मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से।

दूर आसमानो में  बादल हैं घुमड़े ऐसे ,
स्वागत में हों खड़े वो ,ख़ुशियों को लेके जैसे ,
देखा है क्या उन्होंने ,मेरे पिया को आते
मन की   व्यथा को मेरे येही उन्हें  बताते,
बेचैन व्याकुल कितनी ,किससे कहलाऊं यहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

सनसन चलें हवाएं , खड़खड़ करें  किवाड़ें ,
करवट बदलती रातें  ,आँखों में उनकी यादें
आहट लगे है धोखा , लगता है वो यहीं हैं ,
हाथो से  बोलते है ,  पलटू कहीं नहीं हैं,
कैसे संदेसा भेजू ,कैसे उन्हें बताऊँ ,आना उन्हें वहां से,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

मिटटी की  सोंधी खुशबू लिए, पुरवाई आई कहाँ से ,
पंछी करे है ,शोर क्यों इतना ,आने को कोई कहाँ से।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

अहसास 10- सूरज


सुबह सवेरे रोज ही उठकर , सूरज अपनी  किरणे  लेकर ,
बिना बुलाए आ जाता है , जग उजियारा  कर जाता है। 

कौन उसे है रोज उठाता, क्या कोई अलार्म बजाता ,
कैसे फिर वो उठ जाता है,  भर भर रोशनी को लाता है

कैसे वो पाबंद है इतना ,समय चक्र चलता है जितना ,
चाहे कोई कुछ भी बोले , वो बस अपना काम टटोले ,

कुछ भी होय,दुनिया सोए ,वो बस अपने लक्ष्य में खोय ,
कर्म करे जा फल की इच्छा,  मत कर, वो माने लगता है ,

धरती को रोशन कर दिन भर, साँझ ढले जाने लगताहै ,
आसमान  को लाल बना कर ,सागर की सीमा से मिला कर ,

कल आने का वादा करके , मुंह फेरकर सो जाता है ,
सूरज कुछ सिखला जाता है।

सुबह सवेरे रोज ही उठकर , सूरज अपनी किरणें  लेकर ,
बिना बुलाए आ जाता है , जग उजियारा  कर जाता है। 

अहसास 9 -बारिश की बूंदे


बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है  , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं है.

झूमती ,हवा में घूमती, सनसनाती हुई उड़  रहीं हैं ,
छोटी हैं ,थोड़ी सी मोटी हैं,अठखेलियां कर रहीं हैं ,
हवा के साथ में ,जोरो से नाचती ,
हाथ मे हाथ को उसके यूँ बांधती ,
घुंघरुओं की तरह बज रहीं हैं ,

बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं है.

थिरके पांवों से ऐसे नाचे , बादलों में है  बिजली कड़के,
शाख पत्तो से लिपटे-चिपटे ,पेड़ों के  संग जैसे लड़के ,
मीठी धुन पे ,मिस्री घोले ,
हाथ फैलाए ,दिल को खोले ,
बिन हया मस्तियाँ बुन रहीं है ,

बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है  , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं






अहसास 8 -अहसास है हल्का हल्का


लड़का--   अहसास है हल्का हल्का ,आँखों मे कुछ छलका छलका ,
लड़की...   कहते इसे क्या प्यार है ,छाया हमपे क्यों  खुमार है ,
दोनों ..... कुछ ख़ास है ,वो पास है , जीने की मेरे वो आस है।

दोनों....  अहसास है हल्का हल्का , आँखों मे  कुछ छलका छलका। .

लड़की...   देखलो, जी भरके आजतुम , आँखों मे बसा हमको ,
लड़का ... चाहतें  कम,फिर भी होंगी  न , कितना भी देखू तुमको ,
लड़की ... बांहो मे भर लो , जो चाहे कर लो, माना सभी तुमको।

लड़का     अहसास है हल्का हल्का ,आँखों मे कुछ छलका छलका ,
लड़की  ..  कहते इसे क्या प्यार है ,छाया हमपे क्यों खुमार है ,
दोनों ..... कुछ ख़ास है ,वो पास है , जीने की मेरे वो आस है।

लड़की,,,,    हर घडी, देखें हैं तुमको ही, सोते - जागते , बातें करे ,
लड़का,,,    मेरा भी, ऐसा ही हाल है ,कहतें हैं सब ,काली रातें करे,
दोनों,,,,,.... बैठे न चैन है ,करवट बैचैन है ,  तेरे लिए., फरियादें करे।

लड़का      अहसास है हल्का हल्का ,आँखों मे  कुछ छलका छलका ,
लड़की  ..   कहते इसे क्या प्यार है ,छाया हमपे क्यों  खुमार है ,
दोनों ..... कुछ ख़ास है ,वो पास है , जीने की मेरे। वो आस है।

दोनों,,,,,अहसास है हल्का हल्का , आँखों मे कुछ  छलका छलका। .


शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

अहसास 7 -कबीर


बेपरवा बेफिकर ,बादल से बातें कर ,
पानी का ले  बहाव , सागर मे घुल मिलकर
बहती हवा को चीर ,मन में छुपाके धीर ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे है  यह कबीर ,

काहे को है पशेमाँ ,खुद में ही कुछ गुमां ,
धूलों की फांक छांटे , राहों के दरमियाँ ,
 मुठ्ठी में  बंद करके ,सपनो को क्यों है बांधे ,
खुलते ही बिखर जाएँ ,गांठे  क्यों है बांधे ,
कच्चे है सारे धागे , बेमतलब यूँ ही छांटे ,
खूंटे को तोड़ ,सरपट तू दौड़, उखाड़ फैंक कांटे,
मन मे तेरे है बसा , जिसको  तू माने है पीर ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे  है  यह कबीर।

खुशियों के चंद  ये  पल , चल  गांठ में बांध ले,
जोरो से हंस दे तू , मिल बाँट आ काट ले ,
दुनिया है यह तो यूँ ही, ऐसे ही चलेगी यार ,
कोई न  बदल पाएगा इसे,  यूँ हीं ले स्वीकार ,
हाथों की यह लकीरें  ,किस्मत की हैं तस्वीरें
थोड़ा सा सयंम, तू रख ,बदल जाएँगी तकदीरें ,
है हाथ में तेरे ही , कहतें जिसे हैं  तदबीर  ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे  है यह कबीर।

बेपरवा बेफिकर ,बादल से बातें कर ,
पानी का ले  बहाव , सागर मे घुल मिलकर
बहती हवा को चीर ,मन में छुपाके धीर ,

पंछी समान उड़ जा , कहवे है  यह कबीर ,







अहसास 6-उड़ान


उडूं , या फिर यूँ ही चलता रहूं, औरों की तरह ,
इस डर से कि अगर उड़ा, तो कोई दबोच लगा ,
अपने पंजो में कसकर इस तरह ,
कि  निकलने की सोच ही छूट जाएगी।

पर नहीं उड़ा ,तो पंख खुट्टल हो जायेंगे ,
उड़ना तो लगता है ,भूल ही गए हैं यह
खुलेंगे भी नहीं आगे चलकर तो ,
हवा को चीर कर, आसमानो को छूना तो दूर
फुदकने के लायक भी बचेंगे क्या, शक है।

उड़ना तो  खैर स्वाभाविक क्रिया  है ,
जरूरत है ,पड़ेगा ही ,इसमें क्या सोचना ,
रैंगना ,चलना ,दौड़ना और फिर उड़ना ,
यही तो सिलसिला है प्रकृति का ,
अपने छुपे पंखो को फैलाओ ,
फड़फड़ाओ ,हवा की दिशा को भाँपो
पहले कम ऊँचा , फिर और  ऊँचा
और फिर बादलों\ को  छू  आओ।

ऊपर से ही देखने पर हर चीज़ छोटी लगती है ,











बुधवार, 13 जुलाई 2016

अहसास 5 -इश्क


माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,

इसको है समझना ना ,आसान यूँ चुटकी सा ,
लगता है इसे धर लें ,मुठ्ठी बंद  काबू सा ,
इस खेल को हर कोई, चाहे है  कि खेले कुछ ,
हर किसके नहीं बसका ,पल में बेकाबू सा ,

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,


इसका है नशा सर पे, ऐसे चढ़कर बोले ,
कुछ बोलें पागलपन ,कुछ होश नहीं रहता
पट भीतर के खोले ,खुद ही खुद से बोलें,
जगती आखों से वो  सपने देखे रहता।

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है.

किस्से कितने इसके, लिख्खे हैं किताबों में ,
जीता है कभी हारा ,पर हार न ये माना ,
कोई भी हुकूमत हो , कोई भी सियासत हो ,
हर जंग हुई खातिर, सबने है इसे जाना।

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,






मंगलवार, 12 जुलाई 2016

अहसास 4 -उमंग


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया  बेच खाई।

 बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई। 

गाये ,गाये जा तू  , किसको न किसकी पड़ी ,
सोचे इतना तू क्यों  , खुशियों की है फुलझड़ी ,
घूमें- नाचे- कूदे ,करना है जो भी  तू कर ,
फूटे खुशियां ऐसे, पटाखों की जो लड़ी 
धरती हिला दे आज ,सबको दिखा दे आज ,
चकरी है ऐसी घुमाई 
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया बेच खाई 






अहसास 4 -उमंग


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया  बेच खाई।

 बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई। 

गाये ,गाये जा तू  , किसको न किसकी पड़ी ,
सोचे इतना तू क्यों  , खुशियों की है फुलझड़ी ,
घूमें- नाचे- कूदे ,करना है जो भी  तू कर ,
फूटे खुशियां ऐसे, पटाखों की जो लड़ी 
धरती हिला दे आज ,सबको दिखा दे आज ,
चकरी है ऐसी घुमाई 
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,


बजतें हैं ढोल ताशे ,महके हैं शोर  खासे ,
दिल में  उमंगें है लाई ,
ढोलक है धड़क धड़क , फिरके मन फडक फडक ,
खुशियों की घडी है आई ,
रोक न तू खुद को आज ,नाचता रह सारी रात ,
उठ के बिगुल तू बजा ,
दीवानों सा है लगे ,कहता जो कहता रहे,
शरमों  हया बेच खाई 






अहसास 3 -जीवन


जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

चलते चलते  हर पल ,कहता है की चलता रह ,
थमना हैं नहीं एक पल , चलना है की चलता रह ,
फुरसत को तलाशे  क्यों ,  घूमे फिरता है तू 
थकने का समय किसपे , जोरो से है चिल्लाए,

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

आँखों मे भरी है कुछ ,कूदी हुई  किलकारी ,
होटों पे बसी मीठी, गीतों की सदा प्यारी ,
उड़ने को करे है मन  ,पर हैं कहीँ  मिल जाएँ  ,
बादल को मैं छू लूँ , मुठ्ठी मैं समा जाये ,

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

भूला बिसरा बचपन , आंखों में उतर आता  ,
पेड़ों के झुरमुट का, मंज़र है बुला जाता ,
चोटों का , डाटों का , पापा के चांटो का ,
माँ के हांथों का प्यार , है याद बहुत आये 

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ ,  बातें नई सिखलाये।





अहसास २ -बारिश


बारिश की  यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है , रातों के सवेरे से ,
पायल की मीठी सी, गूंजे है बजें मन में  ,
ख्याबो मैं आती वो , बिन बोले धीरे से।

उनके मन को पढ़ना,  आसान नहीं है कुछ ,
आँखों की गहराई ,थाह जिनकी नहीं है कुछ,
होठों की अंगड़ाई में ,लिक्खी  हैं कहानी सी ,
चलती है हवाओं सी, बेपरवाह लगे है कुछ,
सोचूं हूँ चलूँ पूछूं  मैं आज उन्हें फिर से ,
ख्याबो मैं आती क्यों  , बिन बोले धीरे से।

बारिश की   यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।

भीगी भीगी लट को हांथों से कर पीछे ,
पलकों  की चिलमन से बूँदों को पिएं ,रीझें ,
उड़ते से दुप्पटे को कसकर के लपेटें यूँ ,
मुझको हैँ पकड़ करके ,जोरों से जो हैं भींचे ,
नींदों से भरी ऑंखें ,मचले हैं नशे भर से  ,
पांवों मैं है  हलचल यूँ ,बिन पिए शराबी से.

बारिश की यह गुनगुन , कहती  कुछ  धीरे से ,
एक चुप सी आहट है रातों के सवेरे से।


सोमवार, 11 जुलाई 2016

अहसास 1 - मोहब्बत


हम देखें है  सपना, जिसे  नाम  मोहब्बत है ,
इसे  देख देख जीते ,भरी इसमें शरारत है ,

यह खेल अजब ही है  जिसमें  उलझी  पारो ,
कहीं हीर , कहीं  लैला ,शीरी भी  गयी  हारो ,
आँखों में  उतर आती ,एक कसक मशक्कत है ,
इसे   देख देख जीते ,भरी इसमें शरारत है ,

अंकों की  यह दुनिया  क्या  समझेगी इसको ,
यह इश्क इबादत है ,मिलता नहीं है   सबको,
कितने ही जतन करके  ,इसके पीछे भागे ,
इसको पाना खुद से खुद  ही  में करामत  है।

हम देखें है  सपना, जिसे  नाम  मोहब्बत है ,
इसे  देख देख जीते ,भरी इसमें शरारत है ,