जिंदगी , छोड़ आया हूँ , तुम्हें शायद कहीं पर,
पता नहीं चलते या फिर भागते हुये ,
किस मोड़ या फिर किस मुकाम पर ,
याद नहीं पड़ता कहाँ पर ,
कभी मैं भी हंसा करता था,
खिलखिलाता था आसमान की ऊंचाइयों तक,
चाहता था उड़ना हवा की तरह दूर तलक ,
चाहता था कि सारे जहाँ को समेट लूँ अपनी बाँहों में ,
और दौड़कर चूमलूँ पर्वत की उन ऊंचाइयों को,
जहाँ से पानी कलकल करता हुआ बहता चला आ रहा है ,
चाहता था इतना बड़ा बनना ,
कि ढांप लूँ इस पृथ्वी को आसमां की तरह,
और चमकना इस सूरज की तरह,
प्रकाशमान करता हुआ सारे जहान को,
आज भी जब बारिश की बूंदे ,
कांच की खिड़की पर गिरती हुई ,
टप -टप की आवाज़ करती हुई ,
दस्तक देतीं हैं दिल के किसी कोने पर ,
मेरी उँगलियाँ बैचैन होने लगती है
फिर से कागज पर मचलने के लिए ,
कुछ लिखने के लिए ,
कुछ तुम्हारे लिये .........
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