सोमवार, 22 अगस्त 2016

अहसास -28 -कुछ तुम्हारे लिये .........

जिंदगी , छोड़ आया हूँ , तुम्हें शायद  कहीं पर,
पता नहीं चलते या फिर भागते हुये ,
किस मोड़ या फिर किस मुकाम पर  ,
याद नहीं पड़ता कहाँ पर ,

कभी मैं  भी हंसा  करता था,
खिलखिलाता था आसमान की ऊंचाइयों तक,
चाहता था उड़ना हवा की तरह दूर तलक ,
चाहता था कि  सारे जहाँ को समेट  लूँ अपनी बाँहों में ,
और दौड़कर चूमलूँ  पर्वत की उन ऊंचाइयों को,
जहाँ से पानी कलकल करता हुआ बहता चला आ रहा  है ,

चाहता था इतना बड़ा बनना ,
कि ढांप लूँ इस पृथ्वी को आसमां की तरह,
और चमकना इस सूरज की तरह,
प्रकाशमान करता हुआ सारे जहान को,

आज भी जब बारिश की बूंदे ,
कांच की खिड़की पर  गिरती हुई ,
टप -टप की आवाज़ करती हुई ,
दस्तक देतीं हैं दिल के किसी  कोने पर ,

मेरी उँगलियाँ बैचैन होने लगती  है 
फिर से कागज पर मचलने के लिए ,
कुछ लिखने के लिए ,
कुछ तुम्हारे लिये   ......... 







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