सोमवार, 22 अगस्त 2016

अहसास 29 -सपने

मैंने कुछ सपने बुन रक्खे हैं ,
अपनी मजबूरियों के तागो से,
अपने हालात के करघे पर ,
और अपनी हिम्मत व विश्वास की कारीगरी से ,

मैं जानता हूँ कि  मैं एक अच्छा कारीगर नहीं हूँ
कहीं कहीं कुछ गांठे सी पड़  गयी हैं ,
तो कहीं रंगों का मेल ही नहीं हो पाया है ,

पर इसमें भला मेरा क्या कुसूर ,
मुझे याद नहीं पड़ता ,
मुझे  यह सिखाया गया है
कि सपने बुनने कैसे हैं ,
कहाँ से शुरू करने हैं
और कहाँ पे ख़तम ,

हालात का करघा जैसे जैसे चलता गया ,
मैं बुनता चला गया ,
मुझे मालूम ही नहीं पड़ा
कि वक़्त केथपेड़े ,
कब सपनो को तोड़ते चले गए ,

और फिर कब दुबारा मैं उन्ही ,
टूटे -फूटे ,कच्चे, गांठ वाले तागों को ,
जोड़ जोड़ कर दुबारा उसी लगन से ,
सपने बुनता चला गया .......








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