शनिवार, 26 नवंबर 2016

अहसास 48 -थोड़ा हंस लें........

बैठे -बैठे यूँ ही चलो कुछ मुस्कुरा लें हम ,
थोड़ा हंस  लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
भागते  लम्हो को मुठ्ठी में पकड़कर बांधके ,
भरके ,चमकती रोशनी, जुगनू बनालें हम।
बैठे- बैठे यूँ ही चलो................

हाथ को रुखसार पे रख के क्यों सोचे देर तक ,
माथे की गहरी लकीरों को चढ़ा के भाल  तक
लाल स्याही से भरी आँखों को कुछ हंसालें हम,
थोड़ा हंस लें  खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
बैठे -बैठे यूँ ही चलो................


रेत के घर को बचाएगा भला तू कब तलक ,
यह तो उलझी भूलभुलैया ,काहे फिरता तू भटक.
ओस की बूँदे को गिनते ,रात हो जाएगी नम
थोड़ा हंस  लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
बैठे- बैठे यूँ ही चलो................

सुबहो से सहर तलक गिनता फिरे क्यों तू  समय
सांस फूली -चाल बहकी  धड़कने बढ़ती, झूमे ,
होश में बेहोश है ,थाम ले अपने कदम
थोड़ा हंस लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम.
बैठे -बैठे यूँ ही चलो................

बैठे- बैठे यूँ ही चलो कुछ मुस्कुरा लें हम ,
थोड़ा हंस  लें खोल के जी  कुछ गुनगुना लें हम,
भागते  लम्हो को मुठ्ठी में पकड़कर बांधके ,
भरके ,चमकती रोशनी, जुगनू बनालें हम।



बुधवार, 16 नवंबर 2016

अहसास 47 - दिल


दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा ,
खुद को ही सोचे सबसे बड़ा सा ,
किसको न मालूम  ,इसका इरादा ,
दुनियादारी से  ये तो   रहता  खफा, रहता खफा।

दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा,

छज्जे - मेहराबें देखके ये  तो, महलों के ख्याब बनाले
सब कुछ लगे है  इसको आसां , सपनो को ऐसे सजा ले ,
जब भी हो फुरसत , न कोई उल्फत
रंगीन चश्मा, लगाके है ये , नाचे फिरे हर दफा
दुनियादारी से ये तो  रहता खफा, रहता खफा।

दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा

पानी सा निश्चल, बह रौ मे जाये,उफनती नदी सा ये , कलकल ,
बिन पंख इतना ऊँचा उड़े है कि , पल में  मचा , कोई हलचल ,
जिद्दी बहुत है ,करे अपनी बकत है ,
सुनता नहीं है ,कितना भी बोलो , खाये है कितनी जफा,
दुनियादारी से  ये तो  रहता खफा, रहता खफा।

 दिल है यह मासूम ,सीधा साधा ,
कुछ न समझता , पागल है आधा.