रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े ,तारों से लगती ख़फ़ा।
थक गई है लगे,भागते भागते ,
बादलों में छुपे चाँद को भांपते ,
थी हवा भी बड़ी ही पुरजोर से ,
भागे फिरती रही हर एक छोर से ,
स्याह काले घने बादलों से लड़ी,
हाथ जोड़े वो तारो के पीछे पड़ी ,
वो न माने वो खुद ही थे जो डरे
उनकी शामत ही आती जो होते खड़े,
खाती धोखे वो उनसे ही हर दफ़ा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।
फिर जगेगी वो कल एक नये रूप में ,
चमकेगी जैसे सूरज की धूप में ,
कुछ सुहानी, रूमानी समां बांधते ,
कूदते फाँदते साये से नाचते
होठों पे मुस्कुराती कलियाँ लिये ,
ख्याब हँसते हुये ,जिंदगी को जिये ,
जगमगाती हुई तारो से खेलती
चाँद भागे फिरे ,पीछे वो भागती ,
सारी बातें वो देगी यूँ ही भुला ,
कुछ लगेगी नहीं वो इनसे खफ़ा।
रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।
This is about the journey of a beautiful night....
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