शनिवार, 13 अगस्त 2016

अहसास 22 - रात


रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े ,तारों से लगती ख़फ़ा।

थक गई है  लगे,भागते भागते ,
बादलों में छुपे चाँद को भांपते , 
थी हवा भी बड़ी ही  पुरजोर से ,
भागे फिरती रही हर एक छोर से ,
स्याह काले घने बादलों से लड़ी,
हाथ जोड़े  वो तारो के पीछे पड़ी ,
वो न माने  वो खुद  ही थे जो डरे
उनकी शामत ही आती जो होते खड़े,
खाती धोखे वो उनसे ही हर दफ़ा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।

रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।

फिर जगेगी वो कल एक नये रूप में ,
चमकेगी  जैसे  सूरज की धूप में ,
कुछ सुहानी, रूमानी समां बांधते ,
कूदते फाँदते  साये से   नाचते
होठों पे मुस्कुराती कलियाँ लिये ,
ख्याब हँसते हुये ,जिंदगी को जिये ,
जगमगाती हुई तारो से खेलती
चाँद भागे फिरे ,पीछे वो भागती ,
सारी बातें वो देगी  यूँ ही भुला ,
कुछ लगेगी नहीं वो इनसे खफ़ा।

रात सोई अभी है , उसे न जगा ,
चाँदनी ओढ़े , तारों से लगती ख़फ़ा।




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