मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अहसास 31 - मज़ा

 उस ठंडी दोपहर में ,खुली छत पे ,
बंद आँखों पे , खुली किताब ढाँपकर ,
कुछ मुरमुरी धुप में लेते हुए ,
अपने बदन को तापते हुये ,
कुछ गुनगुनाहट अपने आप ही होंठो से फूटने लगी,
कुछ चुभन  थी उसमे , पर कुछ ख़ुशी के छींटे भी थे ,
जो उसको सहला रहे थे ,

पास ही कुछ कबूतर गुड़ गुड़ कर रहे थे,
आपस में न जाने क्या कह रहे थे
एक दूसरे को छेड़ते - गुदगुदाते , चढ़ते ,
कभी उड़ते -कभी भाग रहे थे।

नीचे से कुछ बच्चो की जोर जोर से ,
कुछ न समझ में  आने वाली आवाजें आ रहीं थी ,
न जाने क्या खेल रहे थे ,
अपनी ही दुनिया में  बेसुध कूदते -फाँदते ,

कभी कभी लगता है ना ,
कि छोड़ देना चाहिये  सब कुछ ऐसे ही ,
अपने ही तरीके में  रमने के लिए
कुछ चीज ,कुछ हरकतें।
बेमतलब के ही अच्छी लगती हैं।

पर हम , न जाने क्यों ,हर चीज में ,
बेवजह ही बेसिरपैर का कारण  ढूंढ़ रहे होते हैं,
कुछ अजीब सा गणित बैठाते  हुये,
हासिल को जोड़ते , घटाते ,
अपने दोहरेपन और खोखलेपन को कुरेदते हुये ,
खुद ही को खोखला बना रहे होते हैं

अगर तुम अपनी सांसो को गिनो,
उसकी रफ़्तार को महसूस करके देखो ,
मेरा विशवास  करो , बड़ा ही मज़ा आएगा ,

कुछ नहीं है इसमें , बस एक बार खोके देखो,
यह मज़ा उस पच्चीसवें माले की
बड़ी सी बाहर निकली  हुई , ऊपर से खुली छत पे ,
लटके हुए झूले पे ,पैर  फैलाकर देखो ,
कितना छोटा लगता है ,बाकी सब ,
पर कितना अकेलापन ,

अज़ब मज़ाक है जिंदगी का
जीना है कुछ ऊपर, तो जगह तो मिलेगी ,
पर खोखलेपन के  साथ ,
और नीचे तंग सी भीड़ ही भीड़ ,
एक -दूसरे मे अच्छी सी मथी हुई ,


पर हाँ ,यहाँ जिस्मों की गर्माहट तो है ,
पंछियों की चहचहाट तो है ,
अनगिनत खुशबुओं के ढेर से ,
घुली -मिली सांसों में तीखापन लिए ,
कुछ नक़ाब में लिपटी हुई ,
कुछ खुलके खिलखिलाती हुई
हंसी तो है ,
इसका अपना ही है मज़ा ,

पंछी भी ऊपर और ऊपर ,
आसमान में उड़ते हुए बादल को छूकर ,
नीचे आ जाते हैं ,
पर हैं उनके , वो फिर से उड़ जाते हैं ,
मज़ा लेने के लिए
कभी न ख़तम होने वाला ,
बेमतलब -समझ में  न आने वाला मज़ा    ..

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