शनिवार, 16 जुलाई 2016

अहसास 9 -बारिश की बूंदे


बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है  , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं है.

झूमती ,हवा में घूमती, सनसनाती हुई उड़  रहीं हैं ,
छोटी हैं ,थोड़ी सी मोटी हैं,अठखेलियां कर रहीं हैं ,
हवा के साथ में ,जोरो से नाचती ,
हाथ मे हाथ को उसके यूँ बांधती ,
घुंघरुओं की तरह बज रहीं हैं ,

बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं है.

थिरके पांवों से ऐसे नाचे , बादलों में है  बिजली कड़के,
शाख पत्तो से लिपटे-चिपटे ,पेड़ों के  संग जैसे लड़के ,
मीठी धुन पे ,मिस्री घोले ,
हाथ फैलाए ,दिल को खोले ,
बिन हया मस्तियाँ बुन रहीं है ,

बारिशें गुनगुना यूँ  रहीं है  , जैसे बुँदे नाह  रहीं हैं ,
भीगी भीगी, खुद में सिमटी , खुद ही खुद में, गा रहीं






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