रविवार, 24 जुलाई 2016

अहसास 16 - कारवाँ

यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,
खुद में ही तू एक कारवां।

चलचला तू चल, सोच न रुकने की
कल सुबह सूरज , उगेगा  सुनने की ,
उसकी तरह तू  ,भी है चमक कर ,
भागेंगा सरपट , यूँ आसमां में ,
यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,
खुद में ही तू एक कारवां।

सिलसिला ये चला , तो न रुक पायेगा ,
एक पल भी यहाँ, न तू थम पाएगा ,
 हर लम्हा होगा ,तेरी कहानी
चूमेगा मंजिल, रब की  जुबां  मे ,
यहाँ वहां दोनों जहाँ में
सोचे काहे दरमियां  में
तू ही तू है , हर जगह,

खुद में ही तू एक कारवां

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