मंगलवार, 12 जुलाई 2016

अहसास 3 -जीवन


जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

चलते चलते  हर पल ,कहता है की चलता रह ,
थमना हैं नहीं एक पल , चलना है की चलता रह ,
फुरसत को तलाशे  क्यों ,  घूमे फिरता है तू 
थकने का समय किसपे , जोरो से है चिल्लाए,

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

आँखों मे भरी है कुछ ,कूदी हुई  किलकारी ,
होटों पे बसी मीठी, गीतों की सदा प्यारी ,
उड़ने को करे है मन  ,पर हैं कहीँ  मिल जाएँ  ,
बादल को मैं छू लूँ , मुठ्ठी मैं समा जाये ,

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ , बातें  नई सिखलाये। 

भूला बिसरा बचपन , आंखों में उतर आता  ,
पेड़ों के झुरमुट का, मंज़र है बुला जाता ,
चोटों का , डाटों का , पापा के चांटो का ,
माँ के हांथों का प्यार , है याद बहुत आये 

जीवन है सफर ऐसा, कोई  न समझ पाए 
हर रोज नया है कुछ ,  बातें नई सिखलाये।





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