बुधवार, 13 जुलाई 2016

अहसास 5 -इश्क


माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,

इसको है समझना ना ,आसान यूँ चुटकी सा ,
लगता है इसे धर लें ,मुठ्ठी बंद  काबू सा ,
इस खेल को हर कोई, चाहे है  कि खेले कुछ ,
हर किसके नहीं बसका ,पल में बेकाबू सा ,

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,


इसका है नशा सर पे, ऐसे चढ़कर बोले ,
कुछ बोलें पागलपन ,कुछ होश नहीं रहता
पट भीतर के खोले ,खुद ही खुद से बोलें,
जगती आखों से वो  सपने देखे रहता।

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है.

किस्से कितने इसके, लिख्खे हैं किताबों में ,
जीता है कभी हारा ,पर हार न ये माना ,
कोई भी हुकूमत हो , कोई भी सियासत हो ,
हर जंग हुई खातिर, सबने है इसे जाना।

माया है यह जादू है , यह इश्क यूँ चढ़ता है,
धीरे से  रग् रग् में ,रह रह के फडकता है,






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