शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

अहसास 7 -कबीर


बेपरवा बेफिकर ,बादल से बातें कर ,
पानी का ले  बहाव , सागर मे घुल मिलकर
बहती हवा को चीर ,मन में छुपाके धीर ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे है  यह कबीर ,

काहे को है पशेमाँ ,खुद में ही कुछ गुमां ,
धूलों की फांक छांटे , राहों के दरमियाँ ,
 मुठ्ठी में  बंद करके ,सपनो को क्यों है बांधे ,
खुलते ही बिखर जाएँ ,गांठे  क्यों है बांधे ,
कच्चे है सारे धागे , बेमतलब यूँ ही छांटे ,
खूंटे को तोड़ ,सरपट तू दौड़, उखाड़ फैंक कांटे,
मन मे तेरे है बसा , जिसको  तू माने है पीर ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे  है  यह कबीर।

खुशियों के चंद  ये  पल , चल  गांठ में बांध ले,
जोरो से हंस दे तू , मिल बाँट आ काट ले ,
दुनिया है यह तो यूँ ही, ऐसे ही चलेगी यार ,
कोई न  बदल पाएगा इसे,  यूँ हीं ले स्वीकार ,
हाथों की यह लकीरें  ,किस्मत की हैं तस्वीरें
थोड़ा सा सयंम, तू रख ,बदल जाएँगी तकदीरें ,
है हाथ में तेरे ही , कहतें जिसे हैं  तदबीर  ,
पंछी समान उड़ जा , कहवे  है यह कबीर।

बेपरवा बेफिकर ,बादल से बातें कर ,
पानी का ले  बहाव , सागर मे घुल मिलकर
बहती हवा को चीर ,मन में छुपाके धीर ,

पंछी समान उड़ जा , कहवे है  यह कबीर ,







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