यह जो मैं लिखता हूँ कविता कहीं पर,
कुछ रचता हूँ नया संगीत में ,
बनाता हूँ कोई स्केच किसी कोरे कागज पे,
या फिर लिख देता हूँ ढेर सारे कागज किसी भी विषय पर।
शायद इसलिए क्योंकि
मेरे अंदर छुपा हुआ है एक इंसान
कहीं दूर तक पैठ बनाये हुए ,
जिसकी ख्वाइशें हैं बेहद ,
जो चाहता है उड़ना आसमान में,
और छूना हिमालय की चोटियों को ,
चाहता है पाना सागर की तह को निसंकोच ,
मगर सब कुछ तो संभव नहीं हैं इस जहाँ में ,
जैसे सारी चाहतें नहीं हैं पूरी होती एक जन्म में ,
फिर तो लेने पड़ेंगे मुझे कई जन्म ,
मगर यह भी तो एक ख्याइश ही है
शायद यह एक चक्रव्यू है इन ख्वाइशों का ,
जिसको भेद पाना मुझ अभिमन्यु को नहीं आता ,
काश कोई चाणक्य मुझे भी मिल जाता ,
और बता देता इसे भेदने का रहस्य।
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