शनिवार, 3 सितंबर 2016

अहसास 34 -शांत

कल अचानक सड़क पे चलते -चलते ,
मुझको यकायक ही यह ख्याल आया,
कि चलो आज ,जिंदगी से ही मिलते चले जायें ,
जिंदगी ,जो शुरू हुई थी,आदम और इव से ,
पर अंत पता नहीं कहाँ है
शायद अनंत तक।

वैसे यह मालूम तो किसी को भी नहीं है ,
लेकिन इसकी खोज में सब , एक दूसरे के पीछे ,
पागलो की तरह भागे चले जा रहे हैं ,
कौन बीच में  गिर रहा है ,कैसे संभल रहा है ,
किसको फुरसत है ये देखने की ,
दिन ब दिन लोग बढ़ते जा रहें हैं ,
और  जगह कम होती जा रहीं है ,
थक-थक के गिर रहें हैं तरबतर ,
पर भागने की हौंस दिल में  बढ़ती ही जा रही है ,
पता नहींकिस ओर , और  क्या है इस मृगतृष्णा में।

वहीँ दूर , उन लहराती, ऊँची , खूबसूरत सी ,
आसमां को चूमती , पहाड़ों की वादियों   में ,
जहाँ ,या तो सिर्फ हरियाली है ,
या फिर ,सफ़ेद ,बिलकुल सफ़ेद ,
बर्फ की चादरों  का ओढा हुआ एक मंजर ,
जब वो व्यक्ति ,
जिसकी  मूंछे इतनी बड़ी  हैं कि ,
 दाढ़ी के बीच में  जाकर कहीं खो गयीं हैं ,
जिसके बालों का रंग ,दाढ़ी व मूंछों के रंग के साथ
बिलकुल सफ़ेद हो चूका है ,

पहाड़ों से घिरे उस मंदिर के दालान मे खड़े होकर ,
जब बर्फ के  रंग जैसे शंख को अपने होठों से लगाकर ,
अपने गालों में हवा भरकर ,
आसमान की ओर आँखों को कर ,
पुरजोर से  है बजाता  है ,
तो सारी वादियों  गूँज उठती हैं
उन  मिश्री घुली मीठी सी आवाजों   से ,
जो  भाग -भाग कर जाकर,
 उन ऊँचे -ऊँचे पहाड़ो से टकराकर ,
बताना चाहती हैं ,  कि  वो जिंदगी को पा\चुका है ,
तभी तो वो इतना शांत है ,इतना शांत  ......

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