शनिवार, 24 सितंबर 2016

अहसास 42 - हरेक पल ........

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही ,
कश्मकश में  फँसी ,है भंवर में धंसी ,
थक गयी है लड़े कितना , ढह न जाये कहीं ,

आंच ऐसी लगी  ,सुलगी सुलगी फिरे ,
चूल्हा ठंडा पड़ा , पानी छींटे  गिरें  
राख उड़ है रही ,मुठ्ठी में बांध लूं ,
इससे पहले कि कुछ कसक रह जाये कहीं

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही ,

कोई नहीं गिला ,किसी से रखे है अब ,
उम्मीद की किरण,  गोया बुझ चुकी है जब 
हर इक सुबह वही है ,वही है शाम अब ,
कुछ भी नया नहीं है, राहों में घूमे वहीँ ,

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,

छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही 

शाना नहीं है कोई  सर , रखके रोलें हम
हाले दिल बताएं किसे , जुबां सीके रख्खे हम ,
बेपरवा सांसे तेज चलें ,लड़खड़ायें  कदम
रस्ते का पता है नहीं , मंजिल का पता  नहीं ,

तंग है जिंदगी , कुछ भी हासिल नहीं ,
छोड़ दें लग रहा , हरेक पल है यही

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