शनिवार, 21 मार्च 2020

Poetic talk - अहसास 70-आज सुबह वाक़ई ख़ुशगवार है -22-03-2020

आज सुबह वाक़ई ख़ुशगवार है 
चिड़ियों की चहचहाहट हवा की सुगंध 
इक ठहराव सीने में भर रही है 
पता नहीं इतने कौए कहाँ से  गए हैं आज 
काओं काओं कर मैना से ताल मिला रहे है शायद 
कहीं जाने की जल्दी नहीं है ,
आसमाँ साफ़  सुथरा  दूर तलकआँखों को कितना भला लग रहा है 
गाड़ियों की चीखने चिल्लाने की आवाज़ें पे ,
पंछियों ने आज अपना क़ब्ज़ा कर लिया है दबाके ,
सड़कों ने भी आज कहीं जाना नहीं हैं ,
एकदम चुप सी लेटी हुईं हैं ,
कुत्ते बहुधा रात को ही चिल्लाते हैं 
आज इस चुप्पी से घबराये से दिन में ही आपस में पूछ रहे हैं 
सब ठीक तो है ? 
यह गहमा -गहमी कहाँ टहलने निकल गयी बिन बताए 
समय की सुई तो चल रही है उसी हिसाब से 
पर आज देर हो रही की फ़िक्र को 
ज़ोर से खींच के मानो कहीं दूर फेंक दिया है ,
मुरमुरी धूप में पैर फैलाके यूँ ही ख़ाली आसमाँ को ताकते
दिल की धड़कन में इक   गहरी हूक़ सी उठ रही है ,
इक लम्बी साँस खींचकर  ,अपने फेफड़ों में भरके ,आँखें बंद कर 
इन आवाज़ों में छोड़ दिया अपनेआप को ,
बहने के लिए उस लहराती कूदती फाँदती नदी के शीतल पानी में ,
उन हरे भरे आकाश को चूमते पहाड़ों के बीच , 
जिसके किनारों पे झूमते दरख़्तों की डालियों पे 
कुछ परिंदो के छोटे छोटे घर
पत्तियों की आड़ में लुके -छुपे हैं ,
दूर किसी मंदिर की मीठी घंटी की गूँज 
पानी की कलकल में घुल कानो में चुहल कर रही है 
सोचता हूँ यहीं ठहर जाऊँ अगर बस चले तो , 
पर इंसानी भूख भी मिटानी है , यही चक्र है ...

Krishna BHATNAGR
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