आज लिखते हैं तो
ढूँढें है सुनाने
को कोई ,
होगा एक
दौर यक़ीनन जो
वो ढूँढेंगे हमें,
आज लफ़्ज़ों की क़िल्लत
की बात करते
हैं ,
कल वही पढ़के
किताबों से बताएँगे
किस्से उन्हें,
दबी एक भूख
उतरती है सफ़हे
पर खुलके ,
बंद संदूकचीं के कोने
में छुपा देते
आज जिन्हें ,
कुछ ख़लिश तो है
दिल के कोने
में आवाज़ें करती
,
बिखरी झूठी यह
हँसी होठों पे
छलती आज उन्हें ,
ज़मीं से यूँ हैं जुड़े ,आसमाँ की
बातें करें
देखके खवाईशें ऐसी कि
,रंजिशें हैं उन्हें
.
कहें हैं दोस्त
मगर करते रवाएते
ग़ैरों सी है वो ,
ना खुलके मिलते हैं
,हँसते हैं ,क्या
हुआ है उन्हें
.
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