मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

अहसास 58 -ख्वाईश

आज लिखते हैं तो ढूँढें है सुनाने को कोई ,
 होगा एक दौर यक़ीनन जो वो ढूँढेंगे हमें,

आज लफ़्ज़ों की क़िल्लत की बात करते हैं ,
कल वही पढ़के किताबों से बताएँगे किस्से उन्हें,

दबी एक भूख उतरती है सफ़हे पर खुलके ,
बंद संदूकचीं के कोने में छुपा देते आज जिन्हें ,

कुछ ख़लिश तो है दिल के कोने में आवाज़ें करती ,
बिखरी झूठी यह हँसी होठों पे छलती आज उन्हें ,

 ज़मीं से यूँ  हैं जुड़े ,आसमाँ की बातें करें 
देखके खवाईशें ऐसी कि ,रंजिशें हैं उन्हें .

कहें हैं दोस्त मगर करते रवाएते ग़ैरों सी है वो ,
ना खुलके मिलते हैं ,हँसते हैं ,क्या हुआ है उन्हें .


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