मरने से नहीं
बिछड़ने से डर
लगता है मुझे
,
तुम्हारी आँखों के घूरते
सवालों से डर
लगता है मुझे,
सपनों के घरोंदो
को आशाओं के
धागों से,
उम्मीद की किरणों
के बेफ़िक्र इरादों
से ,
चुन चुन
के बुना है
यह , खोने से
डर लगता है
मुझे,
मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे
कितना हैं सकूँ
मिलता पहलू में
तेरे आके ,
हूँ
भूल गया सब
कुछ तुमको
जहाँ में पाके.
तेरी साँसों के उतार
चढ़ाव से डर
लगता है मुझे
तेरे होंठों की नमी
, स्याही आँखों की ,खींचे
है यूँ
उड़ती
बालों की लट
, माथे की शिकंन बांधे
है यूँ
तेरे
नज़दीक आने
छू जाने से
, डर लगता हैं
मुझे
बारिशों
में संग भीगे
देर तलक कसके पकड़
यूँ
धड़कने मिल
जाए ख़ून की
रवानगी में बहके यूँ
बहक न जाएँ
क़दम , फिसलते हुए डर
लगता है मुझे
मरने से नहीं बिछड़ने से डर लगता है मुझे ,
तुम्हारी आँखों के घूरते सवालों से डर लगता है मुझे
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें