शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

अहसास 57 -मशविरे

मशविरे देते रहते है आजकल मुझको बहुत चलते,
खुदा कोई तो होता जिसे कुछ मैं भी दे पाता,

पीठ पीछे हैं जो बोलें बुराइयों का मैं हूँ पुतला ,
सबको ख़ुश रखना है कैसे ,काश मुझको सिखा जाता,

कुओं से रहट की मीठी सी सुगंध पानी में है घुली,
परिंदों के संग पेड़ों की शाख़ों पे मैं भी उड़ पाता .

लीपे - पुते हुए आँगन से दहलीज़ तक है सजा रास्ता,
कोई आने को है मेहमान नया  यह बता जाता .


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