मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

Poetic talk -अहसास 65- ज़िंदगी..

पानी के रंग में यूँ घुली -मिली ज़िंदगी फुर्र हो गई ...
अभी तो शुरू ही हुई थी, कहाँ खो गयी,
धीरे से छुपती- छुपाती दूर हो गयी
पानी के रंग में यूँ घुली -मिली
ज़िंदगी फुर्र हो गई ..

थोड़ी सी उपर यह थोड़ी सी नीचे
गोते खिलाती बड़े ,
भागे है सब कुछ तेज़ी से इतना
हम तो रह जाएँ खड़े ,
कभी यह हँसाए कभी यह रुलाए ,
कभी बहलाए कभी हैं छकाये
पहेली है बन उड़ गयी
पानी के रंग में यूँ घुली -मिली
ज़िंदगी फुर्र हो गई ..

फूलों की ख़ुशबू में, गीतों की सरगम में ,
ओस की बूँदों से बनी ,
पंछी की बोली में , पानी की कलकल में
ख़ुशियों की डोरो से तनी ,
पुरवा को ले संग ,साँझ से चुरा रंग
बादल पे बैठ गुम गयी
पानी के रंग में यूँ घुली - मिली
ज़िंदगी फुर्र हो गई ..

Krrishna bhatnagar
http://krrishnabhatnagar.wordpress.com/

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें