किसको दरकार है भीड़ में ढूँढे फिरे तुमको ,
हर कोई मसरूफ है ख़ुद में ही खोये ,ढूँढेते ख़ुदको ।
पसीने की लथपथ सांसें , नज़र में बेचैनी की बौछारें,
सहमता सा हुआ लहजा , उठाए हाथ ,दुआएँ माँगता रब को ।
अजब लरज है ज़ुबान में ख़ामोश ख़ुशबुएँ लिए
है धागे रिश्तों के जोड़े , मिठास फीकी लगे किसको ।
भरी जेबें हैं पर दिल ख़ाली सा लिए यह कौन शख़्स है ,
करे है गुफ़्तगू ख़ुद से,हँसे परेशान सा देखे जो परछाईं मे उनको ।
चलो अब मान जाएँ ज़िंदगी है चन्द कुछ सपनो से लफ़्ज़ों की ,
उन्हें समझाए कौन कि हक़ीक़त क्या है ,कुछ ख़बर नहीं उनको ।
नमालूम कब सियाही से शक्ल लफ़्ज़ों की ले ,सफ़हे पे उतर आएँ
यह कम्बख़्त दिल्लगी कमज़ोरी बन इख़्तियार कर लेगी उनको ।
खाएँ क़समें वो कितनी ही चाहें अब यक़ीन दिलाने की ,
भरे बाज़ार में तोहफो को बेफ़िकर घूरते लोग देखे है उनको ।
Krrishna bhatnagar
http://krrishnabhatnagar.wordpress.com/
हर कोई मसरूफ है ख़ुद में ही खोये ,ढूँढेते ख़ुदको ।
पसीने की लथपथ सांसें , नज़र में बेचैनी की बौछारें,
सहमता सा हुआ लहजा , उठाए हाथ ,दुआएँ माँगता रब को ।
अजब लरज है ज़ुबान में ख़ामोश ख़ुशबुएँ लिए
है धागे रिश्तों के जोड़े , मिठास फीकी लगे किसको ।
भरी जेबें हैं पर दिल ख़ाली सा लिए यह कौन शख़्स है ,
करे है गुफ़्तगू ख़ुद से,हँसे परेशान सा देखे जो परछाईं मे उनको ।
चलो अब मान जाएँ ज़िंदगी है चन्द कुछ सपनो से लफ़्ज़ों की ,
उन्हें समझाए कौन कि हक़ीक़त क्या है ,कुछ ख़बर नहीं उनको ।
नमालूम कब सियाही से शक्ल लफ़्ज़ों की ले ,सफ़हे पे उतर आएँ
यह कम्बख़्त दिल्लगी कमज़ोरी बन इख़्तियार कर लेगी उनको ।
खाएँ क़समें वो कितनी ही चाहें अब यक़ीन दिलाने की ,
भरे बाज़ार में तोहफो को बेफ़िकर घूरते लोग देखे है उनको ।
Krrishna bhatnagar
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