शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

अहसास -13 -इल्तिज़ा


सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो बेकस ,कितने  बेहाल ,
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो बेकस, कितने  बेहाल।

झुकी झुकी थी नज़र, भागते  वक़्त संग ,
कहनी थी दास्ताँ , जुबाँ थी ख़ुश्क - तंग ,
बिन बुलाई हवा ,कितनी पुरजोर थी,
चाहे उड़ा ले जाना , सारी यादों को संग।
खामोशियां ही वहां ,जो थी कुछ  बोलती,
पूछने को आये हमें कितने ही ख्याल ,
करने थे उनसे  हमें  अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो ,बेकस कितने  बेहाल ,

आंच सी  जल रही, किस कदर दरमियाँ ,
सुलगी  सी साँस में , दहकती गरमियाँ ,
राख में ढूंढ़ते  चिंगारी हो बची ,
नादाँ दिल से छुपा  , टूटता  आशियाँ
अंजान से बने , तिनको को जोड़ते
जख्मो पे मलहम ले  ,करते मलाल
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

सूखे  होंठों पे कितनी इल्तिज़ा लिए
आये थे वो ,बेकस कितने  बेहाल ,
करने थे उनसे हमें अनजाने अनकहे ,
भूले बिसरे हुए,  सैकड़ो सवाल ।

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